बॉम्बे हाई कोर्ट ने साफ़ गाइडलाइंस जारी की हैं, जिसमें पुलिस को निर्देश दिया गया है कि शुरुआती जांच के लिए बुलाए गए लोगों को FIR दर्ज होने से पहले ही शिकायत की एक कॉपी दी जाए। कोर्ट ने कहा कि शिकायत की डिटेल्स शेयर किए बिना किसी व्यक्ति को पूछताछ के लिए बुलाना नैचुरल जस्टिस और संवैधानिक सुरक्षा के सिद्धांतों का उल्लंघन है।(Complaint Copy Must Before Police Inquiry Bombay HC)
नोटिस में कम से कम आरोपों की साफ़ समरी होनी चाहिए
जस्टिस रवींद्र घुगे और हितेन वेनेगावकर की बेंच ने कहा कि अगर पूरी शिकायत देना मुमकिन नहीं है, तो नोटिस में कम से कम आरोपों की साफ़ समरी होनी चाहिए। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जांच प्रोसेस के दौरान निष्पक्षता पक्का करने के लिए ऐसी ट्रांसपेरेंसी ज़रूरी है।
हाई कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि इस नियम के अपवाद कम होने चाहिए और सिर्फ़ उन मामलों में इजाज़त दी जानी चाहिए जहाँ जानकारी देने से जांच में रुकावट आ सकती है या शिकायत करने वाले या गवाहों के लिए खतरा पैदा हो सकता है। ऐसे मामलों में, पुलिस अधिकारियों को जानकारी रोकने के लिए लिखकर खास कारण दर्ज करने होंगे।
गाइडलाइंस को सभी पुलिस डिपार्टमेंट में सर्कुलेट करने का आदेश
कोर्ट ने राज्य के डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस को आगे निर्देश दिया है कि वे इन गाइडलाइंस को सभी पुलिस डिपार्टमेंट में सर्कुलेट करें ताकि इन्हें एक जैसा लागू किया जा सके और शुरुआती जांच के दौरान मनमानी करने से रोका जा सके।
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