ये राजनीतिक घटनाएं शिवसेना के अकेले चुनाव लड़ने के दावे पर संदेह खड़ा करती है!

कहते है राजनीति में कोई हमेशा के लिये दोस्त नहीं होता और हमेशा के लिए कोई दुश्मन नहीं होता। कोई भी राजनीतिक पार्टी हमेशा मौका देखकर ही राजनीति करती है। भले ही सोनिया गांधी के विदेशी मुल का मुद्दा लेकर उनका जमकर विरोध करनेवाले शरद पवार ने उनकी ही पार्टी के साथ गठबंधन कर सरकार में शामिल हुए तो वही जम्मू कश्मीर में कभी एक दुसरे के धूर विरोधी कहेजानेवाले पीडीपी और बीजेपी में भी सत्ता के लिए गठबंधन हो गया , हालांकी ये गठबंधन अपना पूरा कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाया। राजनीति में सत्ता में आने के लिए कोई भी पार्टी सिर्फ मौके की राह देखते है, फिर चाहे वह केंद्र की बात हो या फिर राज्य में सत्ता पाने के लिए।

महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना की मिलिजूली सरकार है। दोनों ही पार्टियों ने साल 2014 में विधानसभा चुनाव अलग अलग लड़ा था, लेकिन चुनाव के बाद दोनों ही पार्टियां एक साथ आ गई और राज्य में सत्ता बना ली। हालांकी सत्ता में एक साथ आने के बाद भी शिवसेना और बीजेपी के रिश्ते तू त मै मैे वाले ही रहे है। शिवसेना ने बीजेपी पर निशाना साधने का एक भी मौका नहीं छोड़ा है। यहां तक की बीएमसी चुनाव के बाद भी दोनों पार्टियों ने हाथ मिलाया और बीएमसी पर अपना कब्जा किया।

पिछलें कुछ सालों में शिवसेना और बीजेपी के रिश्तों में काफी दूरी देखी गई है। शिवसेना ने पिछले साल दशहर रैली पर यहा तक कह दिया था की वह कोई भी चुनाव अब बीजेपी के साथ मिलकर नहीं लड़ेगी। इसके साथ ही अयोध्या जाकर राम मंदिर का मुद्दा उठाने के बाद शिवसेना ने ये साफ कर दिया की राम मंदिर के मुद्दे पर भी शिवसेना बीजेपी को घेरने के लिए तैयार है। हालांकी पिछलें दिनों कुछ ऐसी राजनीतिक घटनाएं घटी है जिससे शिवसेना के इस दावें पर संदेह होता है की क्या वाकई शिवसेवा ,बिना बीजेपी के साथ के साल 2019 में होनेवाले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में अकेले लड़ सकती है।

केंद्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव

20 जुलाई को तेलुगू देशम पार्टी ने लोकसभा में सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था। जिसके बाद बाद कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने इसका समर्थन किया था। विपक्ष के लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर शुक्रवार को 11 घंटों की लंबी बहस चली जिसके बाद मोदी सरकार ने सदन में अपना बहुमत साबित कर दिया था। हालांकी यहां भी केंद्र सरकार में बीजेपी की सहयोगी शिवसेना ने वोटिंग में हिस्सा नहीं। 18 सांसदों वाली शिवसेना ने यू-टर्न लेते हुए कहा कि वह वोटिंग में हिस्सा नहीं लेगी। जिससे संसद में बहुमत साबित करने की संख्या घट गई और बीजेपी को आसानी से नंबरों का साथ मिल गया। यहा भी शिवसेना अप्रत्यक्ष रुप से बीजेपी का साथ देती नजर आई।

ममता बनर्जी के आमंत्रण को नहीं किया स्विकारा

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई में 19 जनवरी को 20 दलों के नेता बीजेपी के खिलाफ कोलकाता में एक साझा रैली में नजर आये। इस रैली में हिस्सा लेनेवाले सभी पार्टियों ने बीजेपी सरकार का विरोध किया। बीजेपी नेता और सांसद शत्रूघन सिन्हा भी इस रैली में नजर आये। इस रैली के लिए शिवसेना को भी आमंत्रित किया गया था , लेकिन इस रैली में भी शिवसेना ने हिस्सा नहीं लिया।

शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के जरिये बीजेपी और मेदी सरकार पर निशाना साधा है। उद्धव ठाकरे राम मंदिर से लेकर नोटबंदी जैसे मुद्दों पर मोदी सरकार की आलोचना कर चुके हैं। लेकिन इसके साथ ही कुछ राजनीतिक घटनाएं एसी भी हुई जो शिवसेना के अलग चुनाव लड़ने की मंशा पर सवाल खड़ा करते है। हालांकी अब ये समय ही बताएगा की आखिरकार दोनों पार्टियों के बीच में भविष्य में रिश्ते कैसे होंगे।

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