Advertisement

बॉम्बे HC ने रेलवे शू शाइन लाइसेंस के लिए खुली बोली लगाने की CR की पॉलिसी को सही ठहराया


बॉम्बे HC ने रेलवे शू शाइन लाइसेंस के लिए खुली बोली लगाने की CR की पॉलिसी को सही ठहराया
SHARES

बॉम्बे हाई कोर्ट (HC) ने शूशाइन लाइसेंस पर सेंट्रल रेलवे (CR) की 2018 की पॉलिसी को सही ठहराया है। पॉलिसी के मुताबिक लाइसेंस ओपन बिडिंग प्रोसेस से दिए जाने चाहिए। बॉम्बे शू-शाइन वर्कर्स को-ऑपरेटिव सोसाइटी ने इस सिस्टम के खिलाफ पिटीशन फाइल की थी, लेकिन अब कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया है।(Bombay HC Upholds CR's Policy Of Open Bidding for Railway Shoe Shine Licences)

लाइसेंस चुने हुए कोऑपरेटिव ग्रुप्स को

पहले, लाइसेंस चुने हुए कोऑपरेटिव ग्रुप्स को दिए जाते थे। नए सिस्टम में सभी एलिजिबल सोसाइटियों को हिस्सा लेने की इजाज़त है। यह केस तब शुरू हुआ जब सेंट्रल रेलवे ने 2022 में नई बिड मंगाईं। पिटीशनर सोसाइटी ने पॉलिसी को चैलेंज किया। सोसाइटी में 35 मेंबर हैं। वे सैंडहर्स्ट रोड, मस्जिद बंदर और छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस जैसे स्टेशनों पर काम करते हैं।

नई पॉलिसी से उनके रहन-सहन के स्टैंडर्ड को नुकसान

पिटीशनर्स की तरफ से एडवोकेट जेन कॉक्स पेश हुईं। उन्होंने कहा कि नई पॉलिसी से उनके रहन-सहन के स्टैंडर्ड को नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि यह कमजोर तबके को नौकरी देने के असली मकसद के खिलाफ है। उन्होंने यह भी कहा कि कई मेंबर बुज़ुर्ग हैं और अगर उन्हें दूसरी जगह भेजा गया तो उन्हें गंभीर दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा।

जस्टिस भारती डांगरे और मंजुषा देशपांडे की डिवीजन बेंच ने केस की सुनवाई की।  कोर्ट ने कहा कि पिटीशनर काम पर मोनोपॉली का दावा नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा कि उनके अनुभव पर अभी भी विचार किया जाना चाहिए। कोर्ट ने पाया कि कॉन्ट्रैक्ट देने के लिए खुली बोली शुरू करने में रेलवे सही था।

रेलवे एडमिनिस्ट्रेशन ने पॉलिसी का बचाव किया। उसने कहा कि स्कीम का फ़ायदा कुछ सोसाइटियों तक सीमित नहीं किया जा सकता। उसने कहा कि ऐसे कई ग्रुप हैं। खुली बोली सभी एलिजिबल सोसाइटियों को मुकाबला करने की इजाज़त देती है। उसने यह भी कहा कि पिटीशनर सोसायटी भी टेंडर प्रोसेस में हिस्सा ले सकती है।

कोर्ट रेलवे से सहमत था। उसने कहा कि पॉलिसी एक खुले और सबको साथ लेकर चलने वाले सिस्टम को बढ़ावा देती है। उसने पाया कि 2018 की पॉलिसी रोज़ी-रोटी के मौकों और पब्लिक कॉन्ट्रैक्ट के सही बंटवारे के बीच बैलेंस बनाती है। कोर्ट ने पिटीशन खारिज कर दी। उसने रेलवे को टेंडर प्रोसेस जारी रखने की इजाज़त दी। उसने यह भी आदेश दिया कि इन कॉन्ट्रैक्ट में मिनिमम वेज एक शर्त होनी चाहिए।

यह भी पढ़ें- ठाणे में LPG की कीमत बढ़ाने का आदेश लागू होगा

Read this story in English
संबंधित विषय
मुंबई लाइव की लेटेस्ट न्यूज़ को जानने के लिए अभी सब्सक्राइब करें