Marjaavaan Review: बेजान कहानी सिद्धार्थ मल्होत्रा के लिए बनी मुसीबत!

फिल्म को 70-80 के दौर की मसाला फिल्म बनाने की कोशिश की गई है। इस कोशिश के चक्कर में ना फिल्म उस दौर में पहुंच पाई है ना आज के दौर में ठहर पाई। बेजान कहानी के साथ एक्टर जूझते नजर आए हैं।

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राइटर से डायरेक्टर बनें मिलाप जवेरी की फिल्म 'मरजावां' आज सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। फिल्म की कहानी तो वैसे ही ट्रेलर में बयां हो चुकी थी, बस इसके बड़े रूप को थिएटर में देखना बाकी था। आज वह कसर पूरी हो चुकी है। फिल्म को 70-80 के दौर की मसाला फिल्म बनाने की कोशिश की गई है। इस कोशिश के चक्कर में ना फिल्म उस दौर में पहुंच पाई है ना आज के दौर में ठहर पाई। बेजान कहानी के साथ एक्टर जूझते नजर आए हैं। पर फिल्म का म्यूजिक, कुछेक डायलॉग्स, एक्टिंग और कुछ एक्शन सीन्स आपको थिएटर में रोक सकते हैं। 

मुंबई में नारायण अन्ना (नासर) का राज चलता है, वह एक पानी माफिया है। रघु (सिद्धार्थ मल्होत्रा) अन्ना का राइट हैंड है। अन्ना रघु को अपने बेटे से बढ़कर मानता है, यह बात उसके खुद के बेटे विष्णु अन्ना (रितेश देशमुख) को अंदर ही अंदर जलाती है। विष्णु है तो 3 फिट का, पर उसकी सोच उससे भी छोटी है। वह किसी तरह रघु को रास्ते से हटाना चाहता है। उसे यह मौका तब मिलता है, जब रघु की लाइफ में जोया (तारा सुतारिया) आती है। तारा फिल्म में एक गूंगी लड़की का किरदार निभा रही है, जिसे गानें पसंद हैं और वह बच्चों को इसके लिए तैयार करना चाहती है। पर जोया कुछ कर पाए इससे पहले वह अन्ना परिवार का शिकार बन जाती है, जिसे रघु द्वारा मरवा दिया जाता है और जेल चला जाता है। अब उन बच्चों और रघु के दोस्तों का क्या होगा? रघु अन्ना से बदला कैसे लेगा इसके लिए आपको फिल्म देखनी होगी।

सिद्धार्थ मल्होत्रा की एक्टिंग में काफी निखार देखा गया है, उन्होंने एंग्री यंग मैन किरदार को बाखूबी पकड़ा है। पर फिल्म की बेजान कहानी और उलझे डायरेक्शन ने उन्हें ज्यादा कुछ करने का मौका नहीं दिया। रितेश देशमुख ने फिल्म को अपने कंधे पर लेने की कोशिश की है, कुछ कुछ सीन्स देखकर आपको विष्णु से नफरत भी होने लेगेगी। तारा सुतारिया के किरदार को और अच्छे से गढ़ा जाना चाहिए था, क्योंकि यह किरदार फिल्म की आत्मा था। जिसके चलते तारा कुछ खास असर छोड़ती नजर नहीं आई हैं। रकुल प्रीत सिंह से उम्मीदें ज्यादा थीं, पर उन्होंने निराश किया है। फिल्म देखने के बाद आप शाद रांधवा को जरूर याद रखेंगे, स्क्रीन स्पेस कम होने के बावजूद भी उन्होंने अपनी बेहतरीन एक्टिंग से सरप्राइज किया है। 

बेजान कहानी और ढीला-ढाला डायरेक्शन फिल्म के लिए मुसीबत बना है। हलांकि फिल्म का म्यूजिक आपको सिंबा और सिंघम जैसी फिल्मों की याद दिलाएगा बावजूद इसके यह आपको थोड़ा ठीक लगेगा। फिल्म का फर्स्ट हाफ जहां बोर करता है वहीं सेकंड हाफ थोड़ा आपको अच्छा फील कराएगा। 

अगर आप मसाला फिल्मों के शौकीन हैं और एक बार फिर सिद्धार्थ मल्होत्रा और रितेश देशमुख की जोड़ी बड़े पर्दे पर भारी भरकम डायलॉग के साथ देखना चाहते हैं। तो शायद आपको इस फिल्म से निराशा ना हो। पर अगर ऐसा कुछ नहीं है, तो फिल्म ना देखने में ही आपकी भलाई है।  

रेटिंग्स: 2/5

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