जाति देखकर क्यों बचाने की कोशिश की जाती है अपराधियों को?


जाति देखकर क्यों बचाने की कोशिश की जाती है अपराधियों को?
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1) अभी दो दिन पहले बलिया में हुई गोलीकांड में एक व्यक्ति की मौत हो गयी। आरोपी को पकड़ लिया गया, जिसका नाम धीरेंद्र सिंह बताया जाता है। फिर अचानक से वह पुलिस की गिरफ्त से फरार हो जाता है। यही नहीं आरोपी के पक्ष में वहां के स्थानीय बीजेपी विधायक बयान देने लगते हैं, वे भी आरोपी के जाति वाले हैं।


2) हाथरस में हुए रेप कांड में एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें एक शख्स कहता हुआ नजर आता है कि, वह राजपूत है। अब वह आ गया है। किसी में हिम्मत है तो अब सामने आकर बताए।  इसके साथ ही वह और भी आपत्तिजनक बातें कहता नजर आता है।


3) हाथरस कांड में ही पीड़ित लड़की दलित समुदाय की थी। इसके बाद वहां पर दलित लड़की को न्याय दिलाने के नाम पर दलित समुदाय के नेताओं का जमघट लगना शुरू हो गया। अगर ध्यान से देखें तो इसमें लड़की को न्याय दिलाने की जगह मात्र अपनी राजनीति चमकाने के कुछ नहीं हुआ। 


4) बिकरु सामूहिक हत्या कांड के आरोपी विकास दुबे जैसे दुर्दांत अपराधियों के पक्ष में एक खास समुदाय के लोगों ने सोशल मीडिया में जम कर उसके समर्थन में कई पोस्ट किए, इस मामले को कहां से लेकर कहाँ ले जाया गया। 


इन सभी बातों पर अगर गौर करें तो एक बात यह सामने आती है कि, अब एक चलन सा शुरू हो गया है, अपराधियों को बचाने का। इसमें उनके जाति वालों का विशेष योगदान होता है। कोई अपराधी कितना भी खतरनाक अपराधी क्यों न हो, अगर पुलिस उसे एनकाउंटर में मार गिराती है, या किसी अन्य वजहों से उसे कोई सजा हो जाती है तो उसके जाति वाले तत्काल उसे रॉबिन हुड का दर्जा देने लगते हैं। 


ऐसा नहीं है कि ऐसा हर जाति के लोग करते हैं या हर जाति के लोग अपनी ही जाति के अपराधी के बचाव में उतर आती है, लेकिन पिछले कुछ समय से ऐसा कई घटनाओं में देखने को मिला है। हालांकि मैं ऐसा भी नहीं बोल रहा हूँ कि, हर बार अपराधी बेकसूर होता है या हर बार पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाना जायज होता है, लेकिन सोशल मीडिया के इस दौर में अगर आप खबरों की खाक छानेंगे तो पाएंगे कि, अमूमन अब ऐसा करना चलनसार सा बनता जा रहा है।


अंधी भीड़ अब भेड़ बनते देर नहीं लगती है, एक के पीछे एक, लोग बिना सोचे समझे बोलने लगते हैं या समर्थन में उठ खड़े होते हैं। 


हालांकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, और सबको यहां अपनी बात रखने का अधिकार है। लेकिन अपनी बात रखने की आज़ादी में इतनी भी स्वतंत्रता नहीं मिलनी चाहिए कि, किसी खतरनाक अपराधी को लोग शहीद बना दें।


एक विकसित होते समाज और दूनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश में इसकी जगह कतई नहीं होनी चाहिए। खासकर तब, जब वह देश नवयुवकों का हो। अगर देश की न्यायप्रणाली और सजा देने की व्यवस्था ही गड़बड़ होगी तो नवयुवकों को गलत राह पकड़ते देर नहीं लगेगी। इसमें काफी हद तक वे लोग भी जिम्मेदार हैं जिन्हें हम और आप चुनकर संविधान के तहत बनाई गई उच्च पायदान तक पहुंचाते हैं।



अगर हम इतिहास में नजर डालेंगे तो ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जो जेल से सीधा सांसद या विधायक बन गए हैं। या फिर ऐसे भी केसेस है कि निर्दोष व्यक्ति को सजा मिल जाती है, या फिर अपराधी के खिलाफ कोई सबूत ही नहीं मिलता और अपराधी कानून को ठेंगा दिखाते हुए छूट जाता है। 


अब आप ही सोचिए, ऐसी स्थिति में हमारा देश कहां जाएगा। क्या लोगों का सँविधान पर विश्वास रहेगा? क्या लोग न्याय प्रणाली पर भरोसा कर पाएंगे? शायद नहीं। क्या हम और आप आने वाली पीढ़ी को अपराध मुक्त समाज दे पाएंगे? इन सभी प्रश्नों का जवाब है नहीं। 


इसलिए हमें अब अंधी दौड़ से बाहर निकलना होगा। हमें यह देखना होगा कि, अपराध क्या है और उसकी सजा क्या है, यह नहीं कि अपराधी कौन है और वह किस जाति का है। हमें सोशल मीडिया में ऐसा माहौल बनाना होगा कि 

, हर अपराधी अपनी सजा के मुकाम तक पहुंचे। हर बेकसूर को न्याय मिलें। चाहे वह किसी भी जाति का हो या धर्म का।


क्योंकि अपराधियों की न तो कोई जाति होती है और न ही कोई धर्म। क्योंकि अगर आप आग को बढ़ावा देंगे तो एक दिन वह आपका भी घर जलायेगी। एक दिन ऐसा भी आएगा कि, उस जाल से तो आप बच जाएंगे लेकिन आपके बच्चे नहीं।

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