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'नाम में क्या रखा है' किसी महान शख्स द्वारा कहे गए यह शब्द आज के राजनीति के दौर में बहस का मुद्दा बन गए हैं। कुछ नाम'वर लोग तो नाम को लेकर कुछ भी करने के लिए उतारू हो जाते हैं। नाम की राजनीती का ही असर है कि इस समय भारतीय लोग भविष्य छोड़ कर भूतकाल यानी इतिहास अधिक पढ़ने लगे हैं, या जो नहीं पढ़ रहे हैं वे भी कुछ चीजों को लेकर अपना ज्ञान बघारने लगे हैं।

वैसे मेरा मामना है कि शायद ही दुनिया का कोई ऐसा शख्स होगा जिसे अपने नाम से मोह नहीं होगा। अगर उदहारण देखना चाहते हो तो किसी मोटे आदमी को उसके नाम से नहीं बल्कि मोटा कह कर पुकारिये, दिन में तारे न दिखला दे तो कहना। आखिर अपना नाम बिगड़वाना कौन चाहेगा?

आज कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक नाम बदलने का एक प्रचलन सा शूर हो गया है। रेलवे स्टेशन, नगर, चौक, चौराहों से लेकर जिलों तक का नाम बदलने की मांग की जा रही है। नाम भी ऐसे-ऐसे कि एक बार तो अंग्रेजियत में डूबे लोग आसानी से न कह पाएं।

आपको बता दें कि नाम बदलने का इतिहास काफी पुराना है। शुरू में कांग्रेस ने जितने भी जगहों के नाम बदले या रखें सब अपने परिवार के लोगों के नाम पर ही। यूपी में मायावती ने जितने भी जिलों या पार्कों के नाम बदले या रखें सब बहुजन राजनीति के विचार प्रतीक रहे हैं। और अब बीजेपी भी वही कर रही है, जितने भी नाम बदले जा रहे हैं वे हिंदू देवी-देवताओं के नाम पर या फिर संघ के नेताओं के नाम पर रखे जा रहे हैं।

मुंबई में भी नामो को लेकर कई मामले देखने को मिले हैं। राम मंदिर रेलवे स्टेशन का मुद्दा हो या, दादर स्टेशन का नाम बदलने की मांग, या फिर एलिफिंस्टन रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर प्रभादेवी करने का मामला। नामों की राजनीति यहां भी खूब चमकी। कुछ क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां तो नाम और भाषा को लेकर ही अपनी राजनीती चमकाने में लगी हैं।

नामों का बदलना केवल हिन्दुस्तान में ही नहीं होता, आपको बता दूं कि पड़ोसी देश पकिस्तान में भी यह होता रहा है। विभाजन के बाद पाकिस्तान में जितने भी चौक, चौराहों, गली मोहल्लों या फिर सार्वजनिक इमारतों के नाम हिंदू या फिर सिख नामों पर थे सभी को बदल दिया गया। यह अलग बात है कि आज भी सभी स्थानों को पुराने नामों से ही लोग पुकारते हैं।

नाम बदलने की इस छूआछत से हमारी बॉलीवुड भी नहीं बची है, ऐसे कई हीरो या फिर हीरोइंस हैं जिनका असली नाम कुछ और है और फ़िल्मी नाम कुछ और। ऐसे कई हीरो हैं जिनके नाम अगर आपको पता चले तो आग भी वह नाम पुकारने से तौबा कर लें।

देखना है कि इन नामों की राजनीति के क्या राजनीतिक फायदे होते हैं? यह भी देखना है कि युवा वर्ग, जिसके लिए रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के सवाल मुंहबाए खड़े हैं, इन नाम बदलने की राजनीति को कैसे स्वीकार करती है?

वैसे आपको यह भी बता दूं कि जिन महान शख्स ने लिखा था कि 'नाम में क्या रखा है', उन्होंने यह वाक्य लिख कर नीचे अपना भी नाम लिख दिया था...विलियम शेक्सपीयर।

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