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तुकाराम मुंढे : ऐसा IAS अधिकारी, 15 साल की नौकरी में 14 बार हुआ ट्रांसफर

15 वर्ष की अपनी प्रशासनिक सेवा में 14 तबादले देखने वाले तुकाराम मुंढे राज्य के संभवत: पहले प्रशासनिक अधिकारी होंगे।

तुकाराम मुंढे : ऐसा IAS अधिकारी, 15 साल की नौकरी में 14 बार हुआ ट्रांसफर
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कुछ अधिकारी ऐसे होते हैं, जिनका नाम सुनते ही कार्यकुशलता का एक ऐसा दृश्य सामने आता है कि लोग सोचने लगते हैं कि जिसकी पहचान एक कुशल अधिकारी के रूप में है तो उसका बार-बार तबादला (transfer) क्यों होता है। 15 वर्ष की नौकरी में 14 तबादले अगर किसी आईएएस अधिकारी (IAS Officer) के हुए हों तो सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि जब अधिकारी इतना अच्छा है तो बार-बार तबादले क्यों? अब तक की भूमिका में पाठकों को इस बात का पता चल ही गया होगा कि यहां बात किसके बारे में की जा रही है। जी, हां हम उसी कर्मठ अधिकारी तुकाराम मुंढे (tukaram mundhe) की बात कर रहे हैं, जिन पर चरित्र हनन का आरोप लगाकर एक बार फिर उनका मुंबई (mumbai) तबादला कर दिया गया।

2005 बैच के आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे (IAS Officer tukaram mundhe) ने जहां भी काम किया, जिस पद पर काम किया, अपनी एक खास पहचान बनायी है। 15 वर्ष की अपनी प्रशासनिक सेवा में 14 तबादले देखने वाले तुकाराम मुंढे राज्य के संभवत: पहले प्रशासनिक अधिकारी होंगे। यहां सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसा क्या है कि तुकाराम मुंढ़े (tukaram mundhe) भी कहीं टिक नहीं पाते, इसके पीछे के कारणों की मिमांसा करने पर यह बात सामने आती है कि मुंढ़े की कार्यप्रणाली ऐसी है, जो कामचोर पद्धति के लोगों को पसंद नहीं आती है। नागपुर मनपा आयुक्त पद से तुकाराम मुंढे (nagpur municipal commissioner tukaram mundhe) को हटाने के पीछे जो कारण दिया गया है, उस कारण की सघनता से जांच की जानी चाहिए।लेटलतीफ आने वाली नागपुर मनपा (nagpur municipal) की महिला कर्मचारियों तो तुकाराम मुंढे का काम की सख्ती तथा अनुशासन रास नहीं आया तो उन पर चरित्र हनन का आरोप लगाकर मुंढे को नागपुर मनपा आयुक्त पद से हटाकर उनका मुंबई में तबादला करवा दिया।

नागपुर मनपा के कमिश्नर पद पर नियुक्त हुए तुकाराम मुंढे के नागपुर मनपा आयुक्त का पद स्वीकार करते ही उन्होंने सीधे तौर पर महापौर से सीधे तौर पर पंगा ले लिया और इसी पंगे के कारण तुकाराम मुंढे पर इस बार फिर तबादले की गाज गिरी।

तुकाराम मुंढे का कहना है कि मेरे चाहे जितने भी तबादले हों मैं अपने काम के प्रति अनुशासन तथा ईमानदारी नहीं छोडूंगा। किसी कर्मठ अधिकारी पर चरित्र हनन का आरोप लगाकर जिन महिला कर्मचारियों ने तुकाराम मुंढे के 14 वां तबादला करवाया है, उन्हें यह इस बात का सदैव ध्यान रखना होगा कि उन्होंने एक ऐसे अधिकारी को अपने शहर से हटाया है, जिसने अपने काम के बूते पर पूरे राज्य में अपनी पहचान बनायी है। 

अगस्त 2005 से अगस्त 2007 इस कालावधि में सोलापुर (solapur) में प्रकल्प अधिकारी के रूप में काम कर चुके तुकाराम मुंढे सितंबर 2012 से नवंबर 2014 तक मुंबई में बिक्री कर आयुक्त (sale tax officer) पद पर काम किया। यही दो स्थान हैं, जहां तुकाराम ज्यादा समय तक काम किया। नासिक (nasik) में आदिवासी विकास विभाग में सन् 2009 में आयुक्त पद पर तो तुकाराम मुंढे ने तो सिर्फ 3 माह ही काम किया। यह उनकी सेवा का सबसे अल्पकाल वाला विभाग है। तुकाराम मुंढ़े की जगह बी.राधाकृष्णन को नागपुर मनपा का आयुक्त बनाया गया है। मुंढे ने महानगरपालिका की तिजोरी खाली होने का कारण बताकर विकास कार्यों की सभी फाइलों को रोककर रखा था। पहले पुराने काम होंगे, बाद में नए पर ध्यान दिया जाएगा, ऐसी रणनीति अपनाने के कारण महापौर संदीप जोशी तथा वरिष्ठ नगरसेवक दयाशंकर तिवारी ने तुकाराम मुंढे के विरोध में स्वर बुलंद किया था। एक बार तो स्थिति यह भी हुई थी कि नगरसेवकों (Corporator) की ओर से लगाए गए विरोध से व्यथित होकर तुकाराम मुंढे महानगरपालिका की महासभा से नाराज होकर चले गए थे।

कुछ दिनों पूर्व ही तुकाराम मुंढे को नागपुर स्मार्ट सिटी (smart city) के सीईओ पद से मुंढे को हटाया गया था, क्या उस वजह से मुंढे का तबादला किया गया, ऐसी जनचर्चा है। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (chief minister uddhav thackeray) की ओर से प्रशंसा पाने के बावजूद मुंढ़े का तबादला क्यों किया गया, इसे लेकर भी चर्चाएं की जा रही हैं, इससे पहले भी नागपुर शहर का चेहरा मोहरा बदलने वाले टी. चंद्रशेखर की बदली के लिए सत्तारुढ कांग्रेस ने आंदोलन किया था, उस वक्त भी सर्वसामान्य जनता टी चंद्रशेखर की ओर से खड़ी हुई थी।

महानगरपालिका बर्खास्त करने के लिए महाविकास आघाडी सरकार (MVA) ने अर्थात् मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने तुकाराम मुंढे को नागपुर भेजा था, ऐसी चर्चा आरंभ में होती रही।

तुकाराम मुंढे को करोना (COVID-19) होने के बाद उनकी आनन फानन में कौन उनकी बदली कराने के प्रति उत्साही था, कौन सा राजनीतिक समझौता हुआ, इससे किसने लाभ होगा, ऐसे सवाल भी तुकाराम मुंढे के तबादले के साथ ही उपस्थित हुए हैं।शिवसेना और भाजपा वर्तमान में एक दूसरे के नए राजनीतिक शत्रु के रूप में सामने आए हैं।

नागपुर में विधानसभा अध्यक्ष नाना पटोले, पालक मंत्री नितीन राऊत, गृहमंत्री अनिल देशमुख, पशुसंवर्धनमंत्री सुनील केदार, मदद व पुनर्वसनमंत्री विजय वडेट्टीवार तथा विधानसभा में विरोधी पक्षनेता देवेंद्र फडणवीस के साथ-साथ केंद्र के वजनदार मंत्री नितीन गडकरी सीधे तौर पर जुडे हुए हैं। 

तुकाराम मुंढे का बचपन ताडसन्न गांव में व्यतीत हुआ है। गांव में सुबह से शाम तक मेहनत करते थे, उसके बाद साप्ताहिक बाजार में जाकर सब्जी बेचते थे, उसके बाद सप्ताह भर के लिए दो वक्त का भोजन मिलेगा, इस दृष्टि से प्रयत्न करना, गांव में परिस्थति थी। तुकाराम मुंढे को यूपीएससी की परीक्षा के पहले प्रयास में मुख्य परीक्षा में फेल हो गए, उन्हें 865अंक मिले, जो मेरिट के लिहाज से बहुत कम थे, इसके बाद तुकाराम मुंढे ने दोबारा प्रयास किया, उसमें वे प्रिलियम पास हुए, लेकिन मुख्य परीक्षा में फिर असफल हो गए, लेकिन वे निराश नहीं हुए और अपना प्रयास जारी रखा।

तुकाराम मुंढे ने तीसरी बार फिर कोशिश की, तीसरे प्रयास में तुकाराम मुंढे ने प्रिलियम तथा मेन्स दोनों परीक्षाएं उत्तीर्ण की, लेकिन साक्षात्कार में वे सफल नहीं हुए, इसलिए अंतिम सूची में उनका चयन नहीं हुआ।

2000 ते 2003 इस कालावधि में तुकाराम मुंढे ने लेक्चरशिप की, उससे प्राप्त धनराशि से उन्होंने पीएचडी की उपाधि प्राप्त करने की तैयारी शुरु की। 2003 में एमपीएससी की परीक्षा का परिणाम आया। तुकाराम मुंढे का क्लास-2 में सिलेक्शन हुआ। तुकाराम मुंढे ने 2004 में अंतिम प्रयास किया, फिर उसके लिए तैयारी शुरु की। 2004 में तुकाराम मुंढे ने प्रिलियम और मेन्स परीक्षा पास होने का पूरा भरोसा था, इसलिए उन्होंने साक्षात्कार की तयारी शुरु की। 2005 के अप्रैल-मई माह में तुकाराम मुंढे का साक्षात्कार हुआ। 11 मई, 2005 को अंतिम परीक्षा का परिणाम आया, उस वक्त तुकाराम मुंढे की 20 वीं रैंक थी।

मुंढे के मनपा आयुक्त पद से हटते ही नागपुर मनपा में लेटलतीफी फिर शुरु हो गई है। हालांकि मुंढे के तबादले को लेकर युवा सेना तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने अपना विरोध प्रदर्शित किया है, लेकिन केवल कुछ संगठनों के विरोध मात्र से तुकाराम मुंढे जैसे अधिकारी के तबादलों पर विराम नहीं लगेगा, अगर इस पर स्थायी तौर पर विराम लगाना ही है तो तुकाराम मुंढे को अपनी कार्यपद्धति में कुछ इस तरह से बदलाव लाना होगा कि सांप भी मर जाए और लाठी न टूटे।

सुधीर जोशी

(नोट: यह लेखक के अपने विचार हैं, इस लेख का मुंबई लाइव से कोई संबंध नहीं है।)

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