कांग्रेस की हार के 5 प्रमुख कारण

अपनी इस बंपर जीत का दावा कई बीजेपी नेता पहले ही कर रहे थे। लेकिन इस बार के चुनावी रिजल्ट ने विपक्ष के साथ साथ दुनिया को चौंका दिया है। कांग्रेस की इतनी बुरी गत कभी नहीं हुई थी।

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किसी को इस बात को अंदाजा नहीं था कि बीजेपी की अगुवाई में एनडीए का प्रदर्शन इतना तूफानी होगा कि विपक्ष तिनके की तरह उड़ जाएगा। हालांकि अपनी इस बंपर जीत का दावा कई बीजेपी नेता पहले ही कर रहे थे। लेकिन इस बार के चुनावी रिजल्ट ने विपक्ष के साथ साथ दुनिया को चौंका दिया है। कांग्रेस की इतनी बुरी गत कभी नहीं हुई थी। आखिर क्या कारण रहे जो कांग्रेस इतनी औधें मुंह गिर पड़ी। आइये जानते हैं वे 5 कारण जिससे कांग्रेस की हार हुई ...

1. 'चौकीदार चोर है' का नारा पड़ा उल्टा 
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कई रैली में कई बार कह चुके थे कि वे नफरत का जवाब प्यार से देंगे। गुजरात के विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी ने बहुत ही कम मौको पर प्रत्यक्ष रूप से पीम मोदी पर हमला किया था। इसका उन्हें लाभ भी मिला और कांग्रेस ने बीजेपी को लोहे के चने चबवा दिए थे। लेकिन लोकसभा चुनाव में कांग्रेस हर बार मुद्दों से भटकी हुई नजर आई। राफेल मुद्दे को लेकर राहुल गांधी द्वारा कई बार 'चौकीदार चोर है' कहने के बाद कांग्रेस का हर कार्यकर्ता 'चौकीदार चोर है' का नारा देने लगा। यह चुनाव था न कि पर्सनल लड़ाई, साथ ही पीएम पद की एक गरिमा भी होती है। 'चौकीदार चोर है' का यह नारा लोगों को पसंद नहीं आया और यह नारा राहुल गांधी के लिए उल्टा पड़ गया। अगर कांग्रेस अध्यक्ष नकारात्मक प्रचार नहीं करते तो हो सकता है कि कांग्रेस को कुछ सीटों का फायदा हो सकता था।

2. गठबंधन न करना
कांग्रेस की हार के एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है कि उसने कई राज्यों में गठबंधन नहीं किया था। इसमें सीटों के लिहाज से सबसे बड़ा राज्य यूपी भी शामिल था। यूपी में सपा और बसपा ने मिल कर चुनाव लड़ा लेकिन मतभेद के चलते इन दोनों पार्टियों ने कांग्रेस को इस गठबंधन ने शामिल नहीं होने दिया। दिल्ली में भी बार-बार 'आप' और कांग्रेस गठबंधन की ख़बरें आईं लेकिन सीट बंटवारे में मतभेद के चलते इन दोनों के बीच बात नहीं बनी। यही नहीं महाराष्ट्र में कांग्रेस ने एनसीपी के साथ गठबंधन किया था लेकिन वंचित बहुजन आघाड़ी से मतभेद के चलते यहाँ भी बात नहीं बनी। इसके अलावा ममता, नायडू, जगन रेड्डी और सी. चंद्रशेखर राव को नाराज भी किया था। अगर इन राज्यों में कांग्रेस ने गठबंधन किया होता तो आज कांग्रेस के लिए रिजल्ट कुछ और ही होता।

3. कांग्रेस में मतभेद 
इस चुनाव में जिस तरह से कांग्रेस को हार मिली है उसका एक प्रमुख कारण कांग्रेसी नेताओं की आपसी अंर्तकलह भी है। खासकर उन राज्यों में जहां कांग्रेसी सरकारें हैं, वहां के नेताओं के साथ जिस तरह का समन्वय होना चाहिए था, राहुल गांधी नहीं बना सके। जैसे मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में जहां कांग्रेस की ही सरकार है वहां से भी कांग्रेस ने लोकसभा सीट नहीं निकाल पाई। इसका कारण बड़े नेताओं और छोटे कार्यकर्ताओं के बीच पैदा हुआ मतभेद बताया जाता है। चाहे कमलनाथ सरकार हो या अशोक गहलोत की सरकार या फिर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की। बताते है कि इन प्रदेशों में स्थानीय कांग्रेसी नेताओं को आलाकमान से उतना सहयोग नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था। जबकि महाराष्ट्र के कांग्रेसियों के बीच गुटबंदी किसी से छुपी नहीं है। यही हाल कर्नाटक का भी है। सरकार होने के बाद भी वहां कांग्रेस के नेता सिद्धारमैया और कुमार स्वामी के बीच मतभेद कितनी बार जगजाहिर हो चुके हैं।

4. कांग्रेस के पास सीमित नेता 
जिस तरह से बीजेपी और एनडीए का एक मात्र बड़ा चेहरा पीएम नरेंद्र मोदी थे और उन्ही के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जा रहा था लेकिन विपक्ष का कोई भी बड़ा चेहरा नहीं था। कहने को तो कई चेहरे थे लेकिन विपक्ष का नेता कौन है इसी कशमकश में लोग उलझे रहे। हर जगह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के भरोसे ही रैली आयोजित की गयी। ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस का सारा बोझ केवल राहुल और प्रियंका ने उठा रखा है। साथ ही कांग्रेस ने युवा चेहरों को सामने लाने के चक्कर में अपने पुराने चेहरों को साइड लाइन कर दिया साथ ही युवा चेहरों को ढंग से उभरने भी नहीं दिया। इस पूरे चुनावी कैम्पेन में कांग्रेस के पास क्षेत्रीय स्तर पर ऐसा कोई नेता नहीं था जो प्रभावशाली हो।  

5. पुराने ढर्रे पर ही चली कांग्रेस 
कांग्रेस वातावरण के हिसाब से खुद को अपडेट नहीं कर पाई। बीजेपी ने जहां सोशल मीडिया का भरपुर उपयोग किया। बीजेपी ने प्रचार करने के लिए हर माध्यम का सहारा लिया। तो वहीँ बीजेपी के मुकाबले कांग्रेस इन माध्यमों में हर मोर्चे पर पिछड़ी हुई दिखाई दी। एक बात और की बीजेपी के बड़े नेताओं पर अगर विपक्ष हमला करता तो सारे छोटे बड़े नेता मिल कर सामने आ जाते थे लेकिन कांग्रेस में इस चीज की कमी दिखाई दी। बीजेपी के नेता कांग्रेस को घेरने में जहां कोई कोर कसर नहीं छोड़ते थे तो वहीँ कांग्रेस की तरफ से यह केवल कुछ ही नेताओं द्वारा कुछ ही समय के लिए किया जाता था उसके बाद दूसरा मुद्दा पकड़ लिया जाता था।

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