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यह कैसी आजादी है, जहां लोग बोलने में भी डरते हैं और बोलते हैं तो जहर उगलते हैं...

क्या कभी बैठ कर सोचा है आपने की आजादी का क्या मतलब होता है? क्या आप मानते है, की हम सचमुच आजाद हुए है या हम एक आजाद देश के आजाद नागरिक है, दरअसल ये अधूरा सच है कि हमारा देश आजाद हुआ है।

यह कैसी आजादी है, जहां लोग बोलने में भी डरते हैं और बोलते हैं तो जहर उगलते हैं...
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आज 15 अगस्त (15 august) है। आज देश आजादी की 74वीं सालगिरह मना रहा है। यानी हमारे देश को आजाद हुए पूरे 74 वर्ष हो गए। पूरा देश इस आजादी का जश्न मना रहा है। लेकिन आप सोचिए, क्या इस जश्न में वे परिवार शामिल होंगे जो दो दिन पहले बेंगलुरु हिंसा (banglore rights) में प्रभावित हुए हैं। आप सोचिए क्या इस जश्न में वो परिवार साबित होगा जिनके घर के सदस्य दिल्ली दंगे (delhi rights) में मारे गए हैं। क्या इस जश्न में वो परिवार शामिल होगा जिसकी नाबालिग बेटी दरिंदों का शिकार बन गयी। क्या इस जश्न में वो परिवार शामिल होंगे जिन्होंने इस लॉकडाउन में आर्थिक तंगी से आत्महत्या कर ली, इन सभी प्रश्नों का शायद एक ही जवाब है, नहीं! 

तो ऐसी आजादी किस काम की। जहां एक पड़ोसी जश्न मनाए तो उसका पड़ोसी गम के मारे टूट चुका हो। और वैसे भी सभी को आदत पड़ चुकी है इस एक दिनी त्योहार मनाने की। वही होगा हो हम हर साल देखते आ रहे हैं...

लाल किले से हमारे प्रधानमंत्री देश के नाम संदेश देगे और फिर शाम होते ही उसी शान से फहराते तिरंगे को उतार कर बडी हिफाजत के साथ रख दिया जाएगा। नेताजी ध्वजारोहन के बाद अपनी आवभगत से खुश चैन की नींद सो जाएँगे। जनता जनार्दन फिर अपनी दो वक्त की रोटी के जुगाड में लग जाएगी। किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ता है कि पड़ोस में किसी का बेटा, किसी का भाई, किसी का पति दंगे की भेंट चढ़ गया, उनके ऊपर दुख का पहाड़ टूट पड़ा है। और हम भी व्यस्त हो गए अपनी जिंदगी के ताने बाने सुलझाने में।

और अपनी उपरी कमाई कहाँ से की जाए इस उधेडबुन में पड जाएगी। देश और देशभक्ति कही हाशिये पर चले जाएगे और मैं मेरा के फेरे मे एक बार फिर उलझ कर रह जाएंगे हम सब।

क्या कभी बैठ कर सोचा है आपने की आजादी का क्या मतलब होता है? क्या आप मानते है, की हम सचमुच आजाद हुए है या हम एक आजाद देश के आजाद नागरिक है, दरअसल ये अधूरा सच है कि हमारा देश आजाद हुआ है। सिर्फ हमारा देश आजाद हुआ है, हम नहीं।

हम आज भी उस समाज मे जी रहे हैं जहां आजादी का फायदा उठा कर कोई किसी के जाति धर्म, शारीरिक बनावट, रंग पर टिप्पणी कर देता है। हम आज भी उस समाज मे जी रहे हैं जहाँ लोग आजादी का फायदा उठाकर सैकड़ों लोग सड़क पर उतर जाते हैं और लोगों के वाहन, घर जलाकर, पुलिस पर जानलेवा हमला कर हिंसक प्रदर्शन करते हैं। हम आज भी उस समाज मे जी रहे हैं जहाँ लोग महिलाओं के साथ दुष्कर्म की घटनाओं को अंजाम देने से नहीं चुकते। क्या इन सभी को सजा नहीं होती? होती है लेकिन इस तरह की घटनाएं बार बार क्यों होती हैं?

लोग इसलिए भी इन घटनाओं को अंजाम देते हैं कि वे जानते हैं, देश में न्याय कौड़ियों के भाव बिकने लगा है। रक्षक ही भक्षक बन बैठे है। महँगाई, भ्रष्टाचार, आंतक की फरियाद किसे सुनाईये, जब तारक ही संहारक बन बैठे है। उँची कुर्सियों पर बैठे लोग उस उँचाई से जनता की आवाज सुन ही नहीं सकते। सालों साल केस चलता रहेगा, लोग अपनी आपाधापी में सब भूल जाएंगे।

सही बात यह है कि भीड़तंत्र ने लोकतंत्र को निगल लिया है। और हम आज भी अपनी आजादी का जश्न मना रहे है। हमने देश को अंग्रेजो की गुलामी से तो आजाद करवा लिया परंतु हम आज भी गुलाम है। हम आज भी जाति धर्म के बेड़ियों में जकड़े हुए हैं, हम आज भी भ्रष्टाचार में जकड़े हुए हैं, हम आज भी प्रांत वाद और भाषावाद में जकड़े हुए हैं। हम आज भी महिलाओं के लिए अनेक भ्रांतियां मन मे पाले बैठे हुए हैं। जिस नफरत के बीज को अंग्रेज बो कर गए थे, उसे हम आज भी काट रहे हैं, और आगे भी काटते रहेंगे। 

ये आजादी नही है। हमारा देश तभी आजाद होगा जब हर एक देशवासी इस आजादी शरीक होगा। लोग दूसरे के दुख को अपना दुख समझेंगे। लोग दूसरे धर्म के त्योंहार को अपना त्योंहार समझेंगे। लोग दूसरे की बहन बेटी को अपनी बहन बेटी समझेंगे। जब लोग भ्रष्टाचार, प्रांतवाद, भाषावाद, रंग भेद पर एक साथ बोलेंगे तब हमारा देश असली मायनों में आजाद होगा। जिस दिन हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति की आजादी होगी, जिस दिन हर भारतीय को न्यायव्यवस्था पर यकीन होगा, उस दिन सही मायनों में हमारा देश आजाद होगा। तो आइये मिलकर हम ये प्रण लेेतेे हैै कि हम अपने देश को फिर सोने की चिडीया का दर्जा दिलाएंगे और इस धरा को फिर से सुजलाम्-सुफलाम् बनाएँ।

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