आदमियों और जानवरों की बीच संघर्ष की सबसे बड़ी वजह है हम

पिछलें कुछ दशकों से जानवारों के इलाको में मानवों ने अतिक्रमण करना शुरु कर दिया है जिससे जानवर अब धीरे धीरे मानवी बस्ती में आने लगे है ,जनगणना के अनुसार, 2015 में, 35 तेंदुओं की गिनती की गई थी जबकि 2017 में, 41 तेंदुओं की गिनती की गई थी

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अवनी बाघिन जिसे टी 1 के नाम से भी जाना जाता था, को कथित आदमखोर के रूप में जाना जाता था। पिछलें 2 सालों में इस बाघिन ने 13 लोगों की हत्या कर दी। जिसके बाद 2 नवंबर, 2018 को यवतमाल में अवनी बाघिन को उसके दो छोटे बच्चों के सामने मार दिया गया। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अवनी को मारने के लिए इजाजत भी मांगी थी। हालांकी अवनी को मारने के आदेश के बाद बाघिन के लिए क्षमा मांगने वाली ऑनलाइन याचिकाओं की झड़ी लगी गई थी।

अवनी के मरने के बाद कई पशु प्रेमियों ने अवनी की हत्या की जांच करने और उसकेने 10 महीने के शावकों की सुरक्षा के लिए पूरे मुंबई में विरोध प्रदर्शन किया।इस बीच, हत्या की जांच करने वाले राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने खुलासा किया कि बाघिन को शांत करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं को गैर-पेशेवरों और अनधिकृत कर्मियों द्वारा रखा गया था।

अगर हम मुंबई की बात करें तो किसी भी तेंदुए को आदमखोर नहीं कहा गया है लेकिन मुंबई में पशु-मानव संघर्ष एक आम मामला है। रेसक्यूंक एसोसिएशन फॉर वाइल्डलाइफ वेलफेयर (RAWW) के कार्यकर्ता पवन शर्मा का कहना है की अतिक्रमण जानवरो और मानव संघर्ष के बीच कई कारणों में से एक है।

पवन शर्मा का कहना है की “हमारे पूर्वज जानवरों के साथ रहे हैं। वन्यजीव जानवरों और मानव के बीच बातचीत सबसे अच्छी बात है, लेकिन कई लोग इसे मानते नहीं है,कुछ जानवरों के साथ सह-अस्तित्व को नहीं मानते , तो वही कुछ लोग आतंक पैदा करते हैं। शर्मा ने कहा कि विकास तेज गति से बढ़ रहा है, जिससे संघर्ष बढ़ने की संभावना है।"

शर्मा का कहना है की जागरुकता समय की मांग है। उन्होंने कुछ साल पहले हुए एक मामले का उल्लेख किया जब मुलुंड के राहुल नगर में एक तेंदुए ने एक व्यक्ति पर हमला किया जब उसने अपने कुत्ते को बचाने की कोशिश की।

“राहुल नगर की घटना के बाद, हमने वन विभाग के अधिकारियों की मदद से लोगों को जागरूक करने की कोशिश की। हमने कैमरा टैपिंग अभ्यास किया और नियमित गश्त भी की गई। मेरा मानना है कि केवल वन विभाग के अधिकारी ही इसका समाधान नहीं निकाल सकते। राज्य को लोगों का पुनर्वास करना चाहिए और जानवरों को रहने देना चाहिए जहां वे रहते हैं, ”उन्होंने स्वीकार किया कि पुनर्वास आसान नहीं है लेकिन असंभव भी नहीं है।

वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी-इंडिया (डब्ल्यूसीएस) के शोध सलाहकार निकित सुर्वे ने संजय गांधी नेशनल पार्क (एसजीएनपी) में होने वाले मानव-पशु संघर्ष पर बात की।

“मुंबई में जानवरों के हमलों का अतीत था, कुछ घातक थे। पिछले साल एक तेंदुए ने छह बच्चों को घायल कर दिया था और एक की मौत हो गई थी। उसे बचा लिया गया और उसे एक बचाव केंद्र में रखा गया। 2013 के बाद, हमलों में कमी आई है। संजय गांधी नेशनल पार्क वन विभाग के वन्यजीव विंग के अंतर्गत आता है, जबकि आरे वन विभाग के क्षेत्रीय विंग में आता है। ठाणे प्रादेशिक प्रभाग और मुंबई वन विभाग के पास अच्छी बचाव टीम है और दोनों विभाग तेंदुए को बचाने में अच्छे हैं। इस जनवरी में, हमने नानपाड़ा, मुलुंड से तेंदुए को बचाया और जून के महीने में, हमने पार्क से दूर मरोल में एक और तेंदुए को को बचाया। इसके साथ ही हमने एक तेंदुए को भी तीन दिन में रेस्क्यू किया जो एक व्यक्ति के बेडरूम में थे"।

SGNP के अनुसार तेंदुए के आकड़े

2015- 35 तेंदुए
2017- 41 तेंदुए
इलाके - एसजीएनपी, आरे, पवई

सुर्वे ने कहा कि लोगों को अंधेरे के समय काफी ध्यान रखने की जरुरत है और इसके साथ ही लोगों को इस बात का भी ध्यान रखना होगा की तेंदुए मानव बस्तियों से बचते नहीं हैं, वे मनुष्यों से बचते हैं। इसके साथ ही उन्होने कहा की लोग अब जानवरों को लेकर काफी संवेदनशील हो गए हैं, वे पशु कार्यकर्ताओं को बुलाते हैं और बचाव के लिए कहते हैं।

इस बीच, डब्ल्यूटीआई के कार्यक्रम समन्वयक, टीटो जोसेफ ने उल्लेख किया कि कैसे अवैध शिकार, सड़क दुर्घटनाएं और मानव-पशु संघर्ष ने शहरीकरण को बढ़ा दिया है और तेंदुओं के रहनेवाले इलाको को नष्ट कर करते जा रहे है।

2018 की जनगणना के अनुसार,में महाराष्ट्र में देश में दूसरी सबसे ज्यादा तेंदुए की मौत हुई जो 90 थी। जबकि दिल्ली स्थित वन्यजीव समूह, वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी द्वारा वर्ष-दर-वर्ष के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड 93 तेंदुओं की मौत के साथ पहले स्थान पर था। WPSI विभाग ने भारत में 2017 में 431, 2016 में 440, 2015 में 399 और 2014 में 331 मौतें दर्ज की थीं।

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