मुख्यमंत्रीजी , लोगों का मरना कोई रोज की बात तो नहीं!


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राज्य के मुख्यमंत्री को राज्य का मुखिया भी कहा जाता है, राज्य के हित के लिए उन्हे फैसले लेने के अधिकारी है तो वही उनपर कई तरह की जिम्मेदारियां भी होती है। करोड़ो लोगों की सुरक्षा और अन्य बुनियादी सुविधाओं की देखरेख करना, राज्य को आगे बढ़ाना , जरुरी सुविधाएं लागू करना , नई नई स्किम लागू करना जैसे और भी कई महत्तवपुर्ण कार्य मुख्यमंत्री की देखरेख में ही होता है। मुख्यमंत्री के पास इतने सारे सामाजिक काम होते है की अपने बारे में तो छोड़िये वह कई बार तो अपने परिवार को भी समय नहीं दे पाते है, उनका सारा समय सामाजिक जीवन में ही बीत जाता है। लेकिन कभी कभी मुख्यमंत्री साहब को यह भी समझना चाहिए हर घटना को सामान्य तौर पर नहीं लिया जा सकता,कभी कभी कुछ घटनाएं ऐसी होती है की जो सिर्फ प्रशासन की लापरवाहियों पर सवाल खड़ा करते है बल्की एक राज्य और एक शहर में जिंदगी जीने के भरोसे पर सवालियां निशान लगा देते है।

गुरुवार रात को मुंबई से सीएसएमटी स्टेशन के पास हिमालय ब्रिज का बड़ा हिस्सा गिर गया। इस हादसे में 6 लोगों की मौत हो गई और 34 लोग घायल हो गए। इस हादसे में ना ही सिर्फ 6 लोगों की मौत हुई है बल्की 6 परिवार हमेशा हमेशा के लिए उस गम के साये में चले गए है जहा से वह शायद कभी बाहर आ पाए। सरकार ने मृतको के परिजन को 5-5 लाख की सहायता का एलान किया है , लेकिन क्या उन परिवारों के दर्द को इस रकम से कम किया जा सकता है? जो क्या इस दुनियां से इस हादसे के कारण चले गए क्या उन्हे वापस लाया जा सकता है? सरकार ने इस हादसे की जांच के आदेश दे दिये है और हो सकता है की जांच रिपोर्ट आने के बाद संबंधित अधिकारियों पर सरकार कार्रवाई भी करे , लेकिन क्या इस कार्रवाई से एक आम मुंबईकर का भरोसा फिर से जीता जा सकता है?

मुंबई में पिछलें कई सालों से आग लगने , पुल गिरने और अन्य तरह की खबरें आती रही है। ऐसा नहीं है की यह ब्रिज गिरने का हादसा मुंबई में पहली बार हुआ हो , इसके पहले भी ऐसे हादसे हो चुके है लेकिन हर बार प्रशासन एक नई समिती बनाकर और कुछ संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई कर अपना पल्ला झाड़ लेता है। लेकिन क्या सरकार ये सब करने के बाद भी एक आम मुंबईकर के खोते विश्वास को फिर से जिंदा कर पा रही है। सरकारी लापरवाही और राजनीतिक कमजोरियों का आलम ये है की आज मुंबई में जब किसी भी परिवार का कोई भी सदस्य बाहर निकलता है तो उसके परिवार को इस बात की चिंता लगी रहती है की वो शाम को सही सलामत घर आएगा या नही? शहर की बुनियादी सविधाओं और ढांचो पर एक आम मुंबईकर का भरोसा खत्म सा हो गया है।

मुख्यमंत्रीजी आपके पास कई सारे काम होते है , आपके पास इतने सारे सामाजिक और राजनितीक कार्य होते है की आप अपने परिवार तक को कई बार समय नहीं दे पाते । मुख्यमंत्री का ताज कांटो से भरा ताज होता है। राज्य को संभालने के साथ साथ आपको विपक्षी पार्टियों के तीखे सवालो का भी सामना करना पड़ा है। अपनी पार्टी को भी आपको समय देना पड़ता है। हम समझते है की एक मुख्यमंत्री बनने के लिए बहुत सारे त्याग करने पड़ते है , लेकिन क्या आप ऐसे समय भी अगर पार्टी की गतिविधियों से थोड़ा अतिरिक्त समय निकालकर अगर हादसे के बारे में और भी गहराई से अधिकारियों से पुछा होता तो शायद ये बात साफ हो जाती की आखिर कहां चुक रहे गई।

मुख्यमंत्री जी , यह समय मुंबईकरो के खोते हुए विश्वास को जगाने का है ,आज के समय एक आम मुंबईकर को लगता है की वह घर से बाहर तो निकल रहा है लेकिन ऑफिस कब पहुंचेगा , कितने बजेगा पहुंचेगा , पहुंचेगा भी या नही ! कुछ घटनाएं ऐसी होती है जो ना सिर्फ प्रशासन की लापरवाहियों पर सवाल खड़ा करते है बल्की एक राज्य और एक शहर में जिंदगी जीने के भरोसे पर सवालियां निशान लगा देते है।


राज्य के मुख्यमंत्री ने शुक्रवार की सुबह सीएसटी ब्रिज हादसे की जगह का दौरा किया जिसके बाद पहल घायलो से मिलने अस्पताल भी गए। हालांकी इसके बाद वह फिर से अमरावती चले गए जहां उन्होने शिवसेना और बीजेपी के एक संयुक्त कार्यक्रम में हिस्सा लिया। हो सकता है की ये कार्यक्रम पहले से ही तय था , लेकिन क्या इतना बड़ा हादसा होने के बाद इसे टाला नहीं जा सकता था। इस कार्यक्रम में आपके पीछे ऐक बैनर लगा हुआ था जिसमें लिखा था 'मोदी है तो सुरक्षीत भारत', सही बात है आज के प्रधानमंत्री के समय देश में सेना का हौसला तो बुलंद है, लेकिन क्या मुंबईकरो के हौसले इस तरह बुलंद की वह किसी भी सरकारी स्ट्रक्चर पर बिना डर के साथ चल सके?

ये सवाल खड़ा होना लाजमी है क्यों की जो ब्रिज गिरा वह बीएमसी मुख्यालय से महज कुछ कदमों की दूरी पर है , बीएमसी  के उपर पुरे शहर की जिम्मेदारी है लेकिन अगर मुख्यालय से चंद कदम की दूरी पर स्थित ब्रिज की भी स्थिती बीएमसी को सही तरिके से नहीं पता है तो फिर उस बीएमसी पर किस तरह से भरोसा किया जा सके? 


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