विश्व मजदुर दिवस: क्या सही में मजदूरों को उनका हक मिला है?

अब तो मजदूरों के हक़ में आमुलचुल परिवर्तन हुआ है लेकिन यह परिवर्तन शहरी और जागरूक लोगों में ही नजर आता है, जबकि ग्रामीण भागों में अभी भी मजदुर वर्ग शोषित और अपने अधिकारों से वंचित नजर आता है। इसमें सबसे अधिक भुक्तभोगी बच्चे और महिलाएं हैं।

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किसी भी देश की प्रगति में वहां के औद्योगिक विकास की जितनी भूमिका होती है उससे अधिक उस औद्योगिक विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा मजदूरों के विकास पर भी निर्भर करती है। अगर मजदूरों के रहन-सहन का स्तर, शिक्षा उनका सहित मानसिक, शारीरिक, आत्मिक, बौद्धिक एवं सामाजिक स्तर भी ठीक है तो उनके कार्य करने का उत्साह दुगुना होगा और वे अधिक कुशलता के साथ कार्य कर सकेंगे, अगर इनमें विरोधाभास हुआ तो इसमें कोई दो राय नहीं कि काम भी प्रभावित होगा। इन्हीं मजुदुरों के विकास को लेकर हर साल 1 मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता है।

क्या है इतिहास?
दरअसल मजदूरों के अधिकारों को लेकर यह आंदोलन ऐसे ही नहीं हुआ। इसके पीछे है रक्तरंजित इतिहास, जिसका आगाज हुआ था अमेरिका से। अमेरिका में 1 मई 1886 के दिन ही अपने अधिकारों की मांग करते हुए लाखों की संख्या में अमेरिकी मजदुर सड़कों पर उतर आए थे। इन मजदूरों की मांग थी कि लगातार काम करने के घंटों को आठ घंंटे किया जाए। क्योंकि तब काफी संख्या में मजदूर सातों दिन 12-12 घंटे लंबी शिफ्ट में काम किया करते थे और इन्हें इनका मेहनताना भी कम दिया जाता था। बाल मजदुर का भी चलन था. अमेरिका में बच्चे फैक्ट्री, खदान और फार्म में खराब हालात में काम करने को मजबूर थे।

इन्ही सब के चलते अमेरिका में मजदूरों ने विद्रोह प्रदर्शन कर दिया। इसी प्रदर्शन के दौरन ही शिकागो की हेय मार्केट में बम ब्लास्ट हो गया और इसके बाद पुलिस ने गोलियां चला दी, जिसमें कई मजदुर मारे गये। इसीलिए शिकागो शहर में शहीद मजदूरों की याद में पहली बार मजदूर दिवस मनाया गया।

इसके बाद मजदूरों के हक़ में आवाज दुनिया भर से उठने लगी। पेरिस में सन् 1889 से मजदूरों की याद में 1 मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाने के रूप में घोषित किया गया। तब से भारत समेत दुनिया के 80 देशों में 1 मई को राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया जाने लगा। 

ऐसा नहीं है कि भारत में मजदूरों कि यह अधिकार सजा सजाया मिल गया। यहां भी कई आंदोलन, कई हड़ताल और कड़े संघर्ष के बाद भी आज तक मजदूर अपने हक के लिए लड़ रहे हैं. इसकी शुरुआत हुई थी चेन्नई से।किसान पार्टी ऑफ हिन्‍दुस्‍तान ने सबसे पहले 1 मई 1923 को इस दिन की शुरुआत की।  

भारत में मजदूरों की जंग लड़ने के वाले कई बड़े नेता उभरे। इन सबमें सबसे बड़ा नाम था दत्तात्रेय नारायण सामंत उर्फ डॉक्टर साहेब का। इनकी अगुवाई में ग्रेट बॉम्बे टेक्सटाइल स्ट्राइक हुआ था, जिसने पूरे मुंबई के कपड़ा उधोग को हिला कर रख दिया था। इसी का परिणाम था कि बॉम्बे औद्योगिक कानून 1947 बना। इसके अलावा मजदुर नेता के रूप में जॉर्ज फर्नांडिस भी भर कर आये। जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व देश में व्यापक रूप से रेल हड़ताल हुई। इन्हीं आदोलनों से उभरकर वह राष्ट्रीय राजनीति में आए। उनका नाम आपातकाल के दौरान क्रांति करने वाले बड़े नेताओं में गिना जाता है। ऐसा भी कहा जाता है कि इनकी एक आवाज में रेल के पहिये रुक जाते थे।

भारत में साल 1986 में बालश्रम निषेध और नियमन अधिनियम पारित हुआ। इस अधिनियम के अनुसार बाल मजदुर तकनीकी सलाहकार समिति नियुक्त की गई। इस समिति की सिफारिश के अनुसार, बाल मजदूरी पर रोक लगाई गयी।

यही नहीं भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों में शोषण और अन्याय के विरुद्ध अनुच्छेद 23 और 24 को रखा गया है। अनुच्छेद 23 के अनुसार खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है जबकि संविधान के अनुच्छेद 24 के अनुसार 14 साल से कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी फैक्टरी या खदान में काम करने के लिए नियुक्त नहीं किया जायेगा और न ही किसी अन्य खतरनाक नियोजन में नियुक्त किया जायेगा।  

अब तो मजदूरों के हक़ में आमुलचुल परिवर्तन हुआ है लेकिन यह परिवर्तन शहरी और जागरूक लोगों में ही नजर आता है, जबकि ग्रामीण भागों में अभी भी मजदुर वर्ग शोषित और अपने अधिकारों से वंचित नजर आता है। इसमें सबसे अधिक भुक्तभोगी बच्चे और महिलाएं हैं। असली श्रमिक दिवस उस दिन होगा जब इन वंचितों को इनका हक और अधिकारी मिलेगा। तभी हम असली मायनों में मजदूर दिवस मनाने के अधिकारी होंगे।  

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