कपड़े दे भी सकते हैं, ले भी सकते हैं


  • कपड़े दे भी सकते हैं, ले भी सकते हैं
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सांताक्रुज – इंसानियत की दिनों दिन कमी होती जा रही है, लोग अपने काम में इतने व्यस्त रहते हैं कि दूसरे के साथ क्या हो रहा है, उससे उन्हें कोई लेना देना नहीं होता। पर इसी बीच वकोला में ‘माणुसकीची भिंत’ (इंसानियत की दीवार) ने एक बड़ा कदम उठाया है।

शुक्रवार को इस संकल्पना का शुभारंभ हुआ। यह माणुसकीची भिंत तीन दिन तक चलने वाली है। यहां पर जिसके उपयोग के कपड़े नहीं हैं वह रख सकता है और जरूरतमंद उठा सकता है। नंदकिशोर पंतोजी, भास्कर देशमुख, नितीन म्हाडगुत और समर्थ विद्यलाय के विद्यार्थियों ने संकल्पना रखी थी।

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