हाईकोर्ट ने MMRC को दिया झटका, आरे कॉलोनी के आदिवासियों के विस्थापन पर लगाई रोक


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मेट्रो-3 के काम को लेकर MMRDA की काफी फजीहत हो रही है। एक तरह जहां बुधवार को दिल्ली एनजीटी ने आरे कॉलोनी में हो रहे कारशेड काम के खिलाफ स्टे हटाने से साफ़ मना कर दिया तो वहीं दूसरी ओर बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी MMRDA को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि विकास के नाम पर जंगलों से आदिवासियों को, उनके घरों को, उनकी जमीनों को हाथ नहीं लगा सकते।  
 MMRDA ने निर्णय लिया था कि मेट्रो-3 के तहत आरे में जो कारशेड बनाने का काम चल रहा है उसके अंतर्गत आदिवासियों विस्थापित किया जाएगा। सरकार के इस निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गयी थी जिसमे कोर्ट ने आदिवासियों के पक्ष में निर्णय सुनाया।


क्या था मामला?

आपको बता दें कि मेट्रो-3 के लिए कारशेड सहित अन्य कार्यों के लिए आरे में 33 एकड़ जमीन को चुना गया है। काम शुरू करने के लिए आदिवासियों को विस्थापित कर जमीन के निरीक्षण का काम करना था, इसके लिए आरे के प्रजापुर पाड़ा इलाके के लगभग 60 से अधिक घरों और दुकानों को चकाला में विस्थापित किया गया।

नियमों के खिलाफ काम 

एक विस्थापित ने बताया कि सुपर डेवलपमेंट प्लॉन के नियमानुसार अगर इलाके का विकास होता है तो मूल निवासियों को उसी स्थान पर पुनर्वसन करना अनिवार्य है। लेकिन मेट्रो बनाने वाली MMRC ने इस नियम का उल्लंघन किया। यही नहीं चकाला में जो घर अलॉट किये गए हैं वे मात्र 269 स्क्वायर फुट के ही हैं। पीड़ित ने बताया कि हमारे घर और खेत लेकर हमें मात्र 269 स्क्वायर फुट के एसआरए योजना के तहत घर दिए गए हैं जो कि नियम विरुद्ध है।

 

कोर्ट ने सुनाया फैसला

अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ कुछ महीने पहले 5 पीड़ित आदिवासियों ने MMRC के खिलाफ हाईकोर्ट में यचिका दाखिल की थी। इस याचिका में पीड़ितों ने आदिवासियों को विस्थापित नहीं करने की मांग की है। बुधवार को हुई सुनवाई में हाईकोर्ट ने आदिवासियों के पक्ष में फैसला सुनाया और आदिवासियों को विस्थापित नहीं करने का आदेश दिया।

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