'महाशिवआघाड़ी' की राह में बड़े रोड़े, लाख टके का सवाल, 5 साल चलेगी सरकार?

'महाशिवआघाड़ी' सरकार बना भी लेती है तो क्या सरकार अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा कर पायेगी? 'महाशिवआघाड़ी' के सामने सत्ता पाने का रास्ता भी है और उस रस्ते में की कांटे भी हैं जो 'महाशिवआघाड़ी' के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगी।

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महाराष्ट्र (maharashtra) में सरकार बनाने के लिए तीन पार्टियों ने 'महाशिवआघाड़ी' (maha shiv aghadi)नामसे एक गठबंधन बनाया है। ये तीन पार्टियां हैं शिव सेना(shiv sena), कांग्रेस(congress) और एनसीपी(NCP)। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और एनसीपी ने मिल कर चुनाव लड़ा था जबकि शिव सेना ने बीजेपी (BJP) के साथ मिल कर। लेकिन बीजेपी और शिव सेना के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर उपजा विवाद इतना बढ़ गया कि शिव सेना ने बीजेपी से सारे रिश्ते तोड़ते हुए अपनी चिरप्रतिद्वंदी पार्टी कांग्रेस और एनसीपी के साथ हाथ मिला लिया और सरकार बनाने का प्रयास कर रही है। सवाल उठता है कि अगर 'महाशिवआघाड़ी' सरकार बना भी लेती है तो क्या सरकार अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा कर पायेगी? 'महाशिवआघाड़ी' के सामने सत्ता पाने का रास्ता भी है और उस रस्ते में की कांटे भी हैं जो 'महाशिवआघाड़ी' के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगी।

सरकार वैसी है जैसे करेले का गुड़
जब से शिव सेना के नेता सरकार बनाने के लिए एनसीपी और कांग्रेस के नेताओं के साथ बैठक कर रहे है तभी से महाराष्ट्र की राजनीति और भी गरमा गयी है। हर दिन नए-नए मुद्दों पर नई-नई बात सामने आ रही है। शिव सेना, कांग्रेस और एनसीपी ने मिल कर महाशिवआघाड़ी बनाई है। यह आघाड़ी इस समय न्यूनतम साझा कार्यक्रम यानी कॉमन मिनिमन प्रोग्राम पर काम कर रही है। यानी तीनों पार्टियों के बीच ऐसे कुछ मुद्दे हैं जिस पर सभी की सहमति होनी आवश्यक है। अगर विचार किया जाए तो इन पार्टियों को वैचारिक रूप से एक दूसरे पर भरोसा नहीं है इसीलिए ये लोग बैठक के जरिये पहले ही हर मुद्दे पर आम सहमति चाहते हैं। भरोसा हो भी कैसे, शिव सेना पिछले 25 सालों से कांग्रेस और एनसीपी को पानी पी-पी कर कोस रही है। साथ ही शिव सेना सैद्धांतिक और वैचारिक रूप से भी कांग्रेस और एनसीपी से कतई मेल भी नहीं खाती। एक तरह से यह सरकार वैसी है जैसे करेले का गुड़।

सैद्धांतिक और वैचारिक रूप से अलग 
सवाल इसीलिए भी उठान लाजिमी है क्योंकि जब महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी आघाड़ी की सरकार थी तब भी दोनों पार्टियों में आये दिन मतभेद पैदा होता था और जब बीजेपी और शिवसेना की सरकार बनी तब भी शिव सेना सरकार में रह कर भी बीजेपी के लिए किसी विरोधी पार्टी की तरह काम कर रही थी, तो सैद्धांतिक और वैचारिक रूप से एक होकर और सरकार में रह कर भी जब कांग्रेस और एनसीपी में मतभेद पैदा होता था, अब तो शिव सेना जैसी पार्टी भी इनके साथ में है। साथ ही शिव सेना तो मुख्यमंत्री पद के लिए तो सीधे तौर पर दावा भी कर रही है। तो ऐसे में स्थिति किस तरह की पैदा होगी यह तो ऊपरवाला जाने?

सरकार का रिमोट किसके पास?
जैसा की शिव सेना चाहती है उसका मुख्यमंत्री बना भी तो, उसक रिमोट किसके पास रहेगा? क्या शिव सेना अपनी मर्जी से सरकार चला पायेगी? क्योंकि जिस सरकार में शरद पवार जैसे मंझे हुए खिलाड़ी हो उस पार्टी का बिना शरद पवार के सहमति के एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। अगर पिछले दिनों घटे घटनाक्रम को देखें तो 'महाशिवआघाड़ी' के नेता शरद पवार ही नजर आते हैं। अनुभव के आधार पर भी और सरकार चलाने के आधार पर भी। गौर से देखने पर पता तो यही चलता है कि कांग्रेस के साथ-साथ शिव सेना भी पवार के आदेश को मानने के लिए मजबूर है। दूसरी बात सरकार में दिल्ली की दखलंदाजी नहीं होगी इसकी भी क्या गारंटी है?

कई मुद्दों पर टकराव की आशंका
बड़ा सवाल यह भी है कि क्या शिव सेना अपने सिद्धांतों के साथ इतनी आसानी से समझौता कर लेगी। हिंदुत्व का मुद्दा हो, मुसलामानों का मुद्दा हो, स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर को भारत रत्न देने का मुद्दा हो, ऐसे कई मुद्दे हैं जिस पर शिव सेना का कांग्रेस और एनसीपी के साथ टकराव हो सकता है। विधानसभा चुनाव में तो शिव सेना कई बार वीर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग कर चुकी है जबकि कांग्रेस इसका विरोध करती रही है, तो ऐसे में टकराव की स्थिति बन सकती है?

महाराष्ट्र की जनता तो यही चाहेगी कि राज्य में एक स्थिर सरकार बने, जो 5 साल अपना कार्यकाल पूरा कर सके. क्योंकि अब उसके पास फिर से चुनाव के मुहाने पर जाने की हिम्मत नहीं है। काहेकी चुनाव का पैसा फिर से उसकी ही जेब से कटेगा। तो ऐसे में सरकार भले ही विरोधाभाषियों की बन रही है हम तो उपरवाले से यही प्रार्थना करेंगे कि सबका भला हो।

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