जनांदोलन से अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करना आसान होता है और इसी वजह से कुछ महत्वाकांक्षी लोग जनांदोलन के माध्यम से अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करते हैं। इसी श्रेणी में एक नाम इन दिनों खास चर्चा में है और वह नाम है राकेश टिकैत (rakesh tikait) का। राकेश टिकैत केंद्र सरकार की ओर से लागू कैसे गए तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। गणतंत्र दिवस (republic day) के मौके पर राजाधानी दिल्ली में किसानों की टैक्टर रैली के बाद भड़की हिंसा के पश्चात भारतीय किसान यूनियन (bharitya kisan union) के नेता राकेश टिकैत के आंखों से निकले आंसू और जब तक केंद्र सरकार तीनों कानून वापस नहीं ले लेती तब तक कोई भी किसान घर वापस नहीं जाएगा, ऐसे दावा करने वाले राकेश टिकैत की आंदोलन के प्रति देखी जा रही जिद्द ने कुछ वर्ष पूर्व जन लोकपाल बिल के मुद्दे पर समाजसेवी अण्णा हजारे (anna hajare) के साथ आंदोलन पर उतरे अरविंद केजरीवाल ने अपने प्रशासनिक सेवा को छोड़कर राजनीति की ऐसी राह तलाश ली कि वे दिल्ली की जनता के चहेते बन गए और केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए।
गणतंत्र दिवस से पहले तक जो अंदोलन कई किसान संगठनों की संयुक्त शक्ति का प्रतीक था, वह आंदोलन अब राकेश टिकैत पर केंद्रित हो गया है। राकेश टिकैत किसानों के मसीहा कहे जाने वाले महेंद्र सिंह टिकैत के पुत्र हैं और उन्हें किसानों के हितों के लड़ने का जज्बा अपने पिता से ही मिला है। लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव एक-एक बार लड़ चुके राकेश टिकैत के मन में सचमुच किसानों का हित हैं या फिर वे अरविंद केजरीवाल (arvind kejriwal) की तरह ही आंदोलन के माध्यम से अपने भावी भविष्य की नींव का निर्माण कर रहे हैं। 4 जून, 1969 को जन्मे राकेश टिकैत वर्तमान में भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता पद पर कार्यरत हैं।
किसानों के मसीहा महेंद्र सिंह टिकैत के दूसरे पुत्र राकेश टिकैत जिस संगठन से जुड़े हैं, उस संगठन का काम उत्तर प्रदेश में बहुत मजबूती के साथ हो रहा है। जाट समाज से जुड़े राकेश टिकैत किसानों के हितों की बातों के साथ-साथ आंदोलनों के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने में गुरेज नहीं करते। यह बात इसलिए भी कहनी पड़ रही है कि राकेश टिकैत ने दो बार चुनाव मैदान में अपना किस्मत आजमाई है, लेकिन मतदाताओं ने उन्हें सिरे से नकार दिया है।
पिछले लतभग तीन माह से दिल्ली की सीमा पर केंद्र सरकार की ओर से अमल में लाए गए तीन कृषि कानूनों (farmer law bill) को लेकर पंजाब तथा हरियाणा के किसानों के साथ-साथ आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभा रहे राकेश टिकैत तो गणतंत्र दिवस की घटना के बाद तो और ज्यादा प्रखरता से सामने आ गए हैं, अब उन्हें इस बात का आभास हो चला है कि जो बात पहले नहीं हो सकी वह अब हो सकती है। पिछले दिनों गाजीपुर में किसानों को संबोधित करते हुए राकेश टिकैत ने साफ किया कि जब तक केंद्र सरकार कृषि विषय तीनों कानूनों को वापस नहीं लेती आंदोलन जारी रहेगा।
जिन कृषि कानूनों को प्रधानमंत्री समेत केंद्र सकार के सभी वरिष्ठ नेता किसानों के हितैषी बता रहे हैं, उस कानून से खाद्यानों की सार्वजनिक वितरण प्रणाली पूरी तरह से समाप्त हो जाएगी। सरकार किसानों से फसल खरीदकर मनमाने भाव पर उसका विक्रय करेगी। अगर केंद्र सरकार की ओर से अमल में लाए गए कानूनों का विरोध नहीं किया गया तो उससे न केवल छोटे-मोटे किसान बल्कि कृषि उत्पन्न बाजार समिति के कर्मचारी, रोजंदारी मजदूर तथा कृषि क्षेत्र से किसी न किसी तरह से जुड़े लोगों को भारी नुकसान पहुंचेगा।भगवान हुनमान तथा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जैसे आंदोलनजीवी व्यक्तित्वों के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल करते हुए राकेश टिकैत का कहना है कि केंद्र सरकार को कृषि कानून के विरोध में आंदोलन करने वालों किसानों से चर्चा करनी चाहिए न कि उन्हें अपनी सत्ता का दम दिखाकर जेल में बंद करना चाहिए।
राकेश टिकैत भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। सिसोली के किसान नेता के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले राकेश टिकैत ने अपनी लोकप्रियता का दायरा राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाने के मकसद तक पहुंचाने के लिए किसान आंदोलन को एक अस्त्र के रूप में प्रयोग में लाया और राकेश टिकैत इन दिनों जिस तरह से विभिन्न टेलिविजन चैनलों तथा समाचार पत्रों में सुर्खियों में हैं, उससे यह नज़र आने लगा है कि राकेश टिकैत इस आंदोलन के पीछे के राजनीतिक लाभ को तलाश रहे हैं और आंदोलन को लंबा खींचते चले जा रहे हैं।मेरठ विश्वविद्यालय से स्तानकोत्तर की उपाधि प्राप्त राकेश टिकैत ने 1992 में दिल्ली पुलिस में सब इंस्पेक्टर के रूप में भी काम किया है, पुलिस विभाग में रहकर किसानों के हितों के लिए लड़ने का मौका नहीं मिल पाता, इसलिए उन्होंने 1993-94 में दिल्ली पुलिस विभाग की नौकरी छोड़ दी और किसानों को न्याय दिलाने के लिए होने वाले आंदोलनों का हिस्सा बनने संकल्प ही ले लिया। आगामी 20 फरवरी को किसान नेता राकेश टिकैत की महाराष्ट्र के अकोला जिले में एक सभा का आयोजन करने का निर्णय लिया गया है।
कहा जा रहा है कि पहले यह सभा यवतमाल में होने वाली थी, लेकिन कुछ कारणवश अब राकेश की टिकैत की सभा यवतमाल की जगह अकोला में होगी। महाराष्ट्र में संयुक्त किसान मोर्चा राकेश टिकैत की सभा आयोजित कर रहा है। चाहे सभा यवतमाल में हो या अकोला में ज्यादा से ज्यादा संख्या में किसानों का जमावड़ा होना चाहिए। दिल्ली में गणतंत्र दिवस पर हुई हिंसा के बाद आंदोलन कर रहे किसानों को जेल में डाला गया था। अभी-भी 125 किसान जेल में हैं, 27 किसान लापता है। केंद्र सरकार के खिलाफ आक्रोश व्यक्त करने के लिए 18 फरवरी को दोपहर 12 बजे से 4 बजे तक भारतीय किसान युनियन ने रेल रोको आदोलन करने की योजना बनायी है. राकेश टिकैत ने सन् 2018 में हरिद्वार (उत्तराखंड) से दिल्ली तक किसान क्रांति (क्रान्ति) यात्रा निकाली थी। राकेश टिकैत ने सन् 2014 में राष्ट्रीय लोक दल की ओर से लोकसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन इस चुनाव में उनकी जमानत जब्त हो गई।राकेश टिकैट को सिर्फ 9000 वोट ही प्राप्त हुए। नवंबर 2020 में राकेश टिकैत का संगठन भारतीय किसान यूनियन (BKU) में शामिल हुआ। किसानों पर होने वाले अन्याय के खिलाफ आंदोलन छेड़ने वाले राकेश टिकैट अपने पिता के पदचिन्हों पर चल रहे हैं।
अपने पिता महेंद्र सिंह टिकैत ने अपना पूरा जीवन किसानों के हितों के लिए व्यतीत किया। उत्तर प्रदेश के भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष के रूप में लंबे समय तक सेवाएं देने वाले महेंद्र सिंह टिकैत ढाई दशकों से ज्यादा समय तक किसानों के हितों के लिए सरकार से टकरते रहे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा हरियाणा के जाट किसानों में महेंद्र सिंह टिकैत ने किसानों के लिए इतना कुछ किया कि उन्हों किसानों का मसीह का संबोधित किया जाने लगा। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के सिसौली गांव में जन्मे महेंद्र सिंह टिकैत दिसंबर,1986 में ट्यूबवेल की बिजली दर बढ़ाए जाने के विरोध में मुज्जफ्फरनगर के शामली से एक बड़ा आंदोलन शुरु किया था। इस आंदोलन के दौरान एक मार्च, 1987 को किसानों की एक विशाल रैली के दौरान पुलिस गोलीबारी में दो किसान और पीएसी का एक जवान मारा गया था। इस घटना के बाद टिकैत राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह ने महेंद्र सिंह टिकैत की ताकत को पहचाना और स्वयं सिसौली गांव जाकर किसानों की पंचायत को संबोधित किया और उन्हें राहत दी, इसके बाद से महेंद्र सिंह ने टिकैत देश के अधिकांश हिस्सों का दौरा करके किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए आवाज बुलंद की।
राकेश टिकैत के बिल्कुल अलग राह चलते हुए महेंद्र सिंह टिकैत ने स्वयं को किसान आंदोलन तक ही सीमित रखा, उन्होंने राजनीति में जाने के बारे में कभी विचार तक नहीं किया। महेंद्र सिंह टिकैट किसानों के लिए लड़ने वाले ऐसे नेता बन गए थे कि उन्हें किसानों का मसीहा कहा जाने लगा, उनकी एक आवाज पर लाखों किसान को कहीं भी एक साथ खड़ा कर सकती थी। किसानों के बीच वह बाबा टिकैत कहलाते थे। 25 अक्टूबर 1988 को महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में दिल्ली के बोट क्लब में किसानों की रैली की तैयारी थी। कहने का आशय यह है कि राकेश टिकैट अपने पिता की तरह किसानों के हितों के लिए आवाज उठाने के साथ-साथ राजनीति में भी भाग्य आजमाया है, यानि मौके का फायदा उठाने में राकेश टिकैट पीछे नहीं रहे हैं, इसीलिए अब यह कहा जाने लगा है कि राकेश टिकैट दूसरे अरविंद केजरीवाल बनने की राह पर हैं, आने वाले दिनों में अगर राकेश टिकैट किसान नेता से राजनेता बने दिखायी दे जाए तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। किसान आंदोलन के समर्थन में मुंबई में विधानभवन से अगस्त क्रांति मैदान तक ट्रैक्टर रैली निकालकर राकेश टिकैट को समर्थन देने जैसा ही है, अब देखना यह है कि ऊंट किक करवट बैठता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, यह उनके अपने विचार हैं।)