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NCP सुप्रीमों शरद पवार का उपवास, 'बाबू समझो इशारे'

राजनीति में बने रहने के लिए कुछ नाटक करते रहने चाहिए यह बात शरद पवार से बेहतर और कौन जान सकता है।

NCP सुप्रीमों शरद पवार का उपवास, 'बाबू समझो इशारे'
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राजनीति में कुछ नेता ऐसे होते है, जिनके हर काम पर जनता की नजरें होती हैं और बात जब राकांपा सुप्रीमों शरद पवार (NCP chief sharad pawar) से जुड़ी हो तो वह दूर तलक अवश्य जाएगी। शरद पवार वर्तमान राजनीति का रंग समझते हुए भविष्य की राजनीति की मजबूत नींव की ज्यादा चिंता करते हैं, शायद यही कारण हैं राज्यसभा के उपसभापति के साथ हुए अभद्र व्यवहार के मुद्दे पर वे निलंबित सांसदों के साथ बैठकर अन्न त्याग आंदोलन करते हैं, लेकिन मराठा समाज को आरक्षण दिए जाने के मुद्दे पर कभी अन्न त्याग की घोषणा नहीं करते। राजनीति में बने रहने के लिए कुछ नाटक करते रहने चाहिए यह बात शरद पवार से बेहतर और कौन जान सकता है। 

महाराष्ट्र में आज जिस सरकार का अस्तित्व है, वह सरकार शरद पवार के प्रयासों का ही नतीजा है। सत्ता और स्वार्थ से जुड़े विषयों पर ज्यादा दिलचस्पी तथा किसानों, जनहितों के जुड़े विषयों को दूसरी वरीयता देने वाले शरद पवार की राजनीति को समझना आसान काम नहीं है। सदैव अपने हिसाब से राजनीति करने वाले शरद पवार के साथ इतना बड़ा जनाधार क्यों है, यही सबसे बड़ा सवाल है। विधानसभा चुनाव के समय की सभा में पानी में भीगते हुए मतदाताओं से वोट मांगने की बात हो या फिर निलंबित सांसदों के समर्थन में अन्न त्याग कर शरद पवार (sharad pawar) ने एक बार फिर यह बताने की कोशिश की है कि वे एक अलग धारा के नेता हैं।   

राज्यसभा में कृषि विधेयक (farmer bill) के दौरान हो हंगामा मचाने वाले सांसदों को निलंबित करने की कार्रवाई के कारण राकांपा प्रमुख शरद पवार को इतना दुख पहुंचा कि उन्होंने एक दिन का अन्न त्याग किया। निलंबित सांसदों के मुद्दे को मराठा आरक्षण (maratha reservation) से ज्यादा महत्व देकर शरद पवार ने जो संकेत दिए हैं, उन्हें बड़ी गंभीरता से सोचना होगा। राज्यसभा के कामकाम में गतिरोध पैदा किए की वजह से निलंबित सासंदों के लिए एक दिन का अन्न त्याग करके राकांपा प्रमुख शरद पवार ने यह स्पष्ट तक दिया है कि शरद पवार संसद के अंदर के लोगों की ज्यादा फिक्र करते हैं। 

शरद पवार बकायदा पहले से घोषणा करके अन्न त्याग किया, इस अन्नत्याग से न तो देश के किसानों को कोई लाभ हुआ और न ही किसी समाज विशेष को, हां इतना जरूर हुआ कि शरद पवार ने भविष्य में अपने लिए नई जगह की संभावनाएं तलाश ली हैं। राज्यसभा के उपसभापति के साथ किए गए अशोभनीय व्यवहार के विरोध में निलंबित सदस्यों ने संसद परिसर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (mahatama gandhi) के पुतले के पास एक दिवसीय अनशन को राकांपा सुप्रिमो शरद पवार ने एक दिवसीय अन्नत्याग करके जो समर्थन दिया, उसको अलग-अलग राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है। भाजपा नेता तथा राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री विनोद तावडे (vinod tawade) ने शरद पवार पर कटाक्ष करते हुए कहा कि मराठा क्षत्रप ने अगर मराठा समाज को आरक्षण देने के मुद्दे पर अन्नत्याग किया होता तो शरद पवार का राजनीतिक कद और ज्यादा बढ़ जाता, लेकिन शरद पवार ने अशोशमनीय व्यवहार करने वाले निलंबित सांसदों को समर्थन देने के लिए एक दिन का अन्नत्याग करके यह साफ कर दिया कि वे संसद के अपने क्षेत्र के लोगों की फिक्र ज्यादा करते हैं। 

 कृषि विधेयक यानि मोदी सरकार (modi government) की ओर से किसानों की आय दुगुनी करना है, ऐसे में मोदी सरकार के इस विधेयक का विरोध करने से शरह पवार को क्या हासिल होगा, यह तो वे ही बता सकते हैं, लेकिन शरद पवार जैसे नेता राज्यसभा के उपसभापति के साथ अशोभनीय व्यवहार करने वालों का समर्थन करके किसानों तथा मराठा समाज दोनों को नाराज किया है। शरद पवार को अगर कुछ बदलाव के बारे में बताना था तो वे अपनी बात राज्यसभा में रखते, सरकार ने उनकी बात पर जरूर ध्यान दिया होता.  राज्यसभा में कृषि विषयक विधेयक पर विरोधी पक्षों को अपना पक्ष रखना था, लेकिन विरोधी पक्ष के नेताओं को अपना पक्ष रखने का अवसर न देकर ध्वनि मत से मतदान कराकर विधेयक मंजूर करवाना शरद पवार को रास नहीं आया, उनका कहना है कि ऐसा करके शरद पवार ने राज्यसभा में सदन की गरिमा का अवमूल्यन किया था। अगर शरद पवार को उपसभापति के कार्यप्रणाली पर आपत्ति थी तो वे अपना विरोध कितनी अन्य माध्यम से व्यक्त कर सकते थे।   

उसभापति ने आदर्श विचारों को तिलांजलि देने का काम किया है, ऐसा दावा भले ही शरद पवार कर रहे हो, लेकिन शरद पवार ने जिन सांसदों के समर्थन में एक दिवसीय अन्न त्याग किया, वे भी दूध के धुले नहीं थे। शरद पवार ने देश के कृषि मंत्री रहते समय कभी किसानों के हितों को लेकर अन्न त्याग जैसा कोई आंदोलन नहीं किया, फिर राज्यसभा के सदन में अशोभनीय बर्ताव करने वाले सांसदों के साथ एक दिवसीय अन्य त्याग करके शरद पवार क्या बताने की कोशिश की है, इसलिए शरद पवार के एक दिवसीय अन्न त्याग के राजनीतिक नाटक के बारे में सिर्फ इतना ही कहना उचित है कि बाबू समझो इशारे...

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