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ठाकरे सरकार के मंत्रियों के लिए नहीं लागू होते कोरोना के नियम?

कार्रवाई करने में जनता तथा नेता के बीच अंतर की जो नीति अपनाई जा रही है, वह गुढ़ खाकर गुलगुले से परहेज करने जैसी कहावत को चरितार्थ करती है।

ठाकरे सरकार के मंत्रियों के लिए नहीं लागू होते कोरोना के नियम?
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देश की आर्थिक राजधानी मुंबई (financial capital Mumbai) समेत पूरे महाराष्ट्र (maharashtra) के समक्ष एक बार फिर कोरोना महामारी (Corona pandemic) के व्यापक स्तर पर फैलाने की आशंका उत्पन्न हो गई है। स्वदेशी वैक्सीन (vaccine) आने और उसके चरणबद्ध तरीके से लगने के बीच महाराष्ट्र में कोरोना के बढ़ते पांव पर कैसे नियंत्रण रखा जाए, यह बहुत बड़ा सवाल महाराष्ट्र सरकार तथा उससे जुड़े हर जिले के प्रशासन से सामने खड़ा हो गया है। कोरोना की रोकथाम के लिए जो नियम बनाए गए हैं, जो निर्देश दिए गए हैं, उनके अनुपालन को लेकर समानता नहीं देखी जा रही। जनता अगर मास्क नहीं लगा रही है तो उस पर नियम का पालन न करने का हवाला देकर उनसे जुर्माना वसूला जा रहा है, लेकिन सार्वजनिक स्थलों पर नेताओं, मंत्रियों के बिना मास्क के पहुंचने पर कोई कार्रवाई नहीं की जा रही। जनता से कहा जा रहा है कि वे सोशल डिस्टेंसिंग (social distance) का पालन करें लेकिन नेता, मंत्री और उनके कार्यकर्ता कोरोना के फैलाव को रोकने के लिए दिए गए निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं। 

सामान्य लोगों से विवाह समारोह में नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माना वसूला जा रहा है तो किसी राजनेता के घर शादी समारोह में कोरोना बचाव विषयक सभी नियमों की धज्जियां उड़ायी जा रही हैं। कोरोना (Covid 19) से बचने के लिए सरकार ने भले ही एक समान नियम बनाए हों, सभी के लिए एक समान निर्देश दिए हों, लेकिन जब कार्रवाई की बारी आती है तो नेता तथा जनता के बीच भेद की दीवार खड़ी कर दी जाती है। पुणे में पिछले दिनों आयोजित एक विवाह समारोह में कोरोना से बचाव के सभी नियमों को ताक पर रख दिया गया। जहां एक ओर पुणे (Pune) में हुई इस शाही शादी में 1200 लोगों का जमावड़ा हुआ, वहीं दूसरी ओर इस शादी समारोह में आए नेताओं, अतिथियों में से अधिकांश लोगों ने मास्क नहीं पहना था। न तो मास्क, न तो सामाजिक दूरी और न ही सैनेटाइजर का उपयोग, जाहिर है, जब ऐसा होगा तो कोरोना का प्रसार बढ़ेगा ही, उसे कोई रोक नहीं पाएगा।

मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (uddhav thackeray) ने ऐतियात के तौर पर राज्य में राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक सभी तरह के आयोजनों पर रोक लगा दी है। कोरोना के दूसरी बार फैलने के लिए धार्मिक कार्यक्रमों, विवाह समारोह तथा जनता की ओर से बरती जा रही लापरवाही को जिम्मेदार बताया जा रहा है, लेकिन इसके लिए नेताओं, मंत्रियों की लापरवाही को नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है। कार्रवाई करने में जनता तथा नेता के बीच अंतर की जो नीति अपनाई जा रही है, वह गुढ़ खाकर गुलगुले से परहेज करने जैसी कहावत को चरितार्थ करती है। पिछले वर्ष 2020 में जब कोरोना ने कहर बनकर महाराष्ट्र समेत पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया था, तब सभी हताश, निराश तथा लाचार दिखायी दे रहे थे, लेकिन जब 2021 के शुरु होते ही कोरोना से बचाव का स्वदेशी टीका आया तो सभी के मन में यह आस जगी कि अब कोरोना का कहर समाप्त हो जाएगा, वह दम तोड़ देगा, लेकिन जब फरवरी 2021 के मध्य काल में देश के कुछ हिस्सों से फिर ये खबरें आने लगीं कि कोरोना फिर पांव पसारने लगा है तो मानो पैरों के नींचे की जमीन ही खिंसक गई।  

महाराष्ट्र और कर्नाटक में दूसरे दौर का कोरोना अपना असर दिखाने लगा है। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले अमरावती, अकोला, नागपुर, वर्धा, यवतमाल के साथ-साथ राज्य की राजधानी मुंबई के कुछ क्षेत्रों के अलावा शिक्षानगरी पुणे में कोरोना एक बार फिर पांव पसार रहा है, इसके लिए लोगों की लापरवाही को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। महाराष्ट्र में वसंत पंचमी के शुभ मुहूर्त पर अनेक विवाह होते रहे हैं, इस वर्ष भी वसंत पंचमी के मौके पर अनेक विवाह समारोह आयोजित किए गए वसंत पंचमी से शुरु हुए  विवाह मुहूर्त का सिलसिला जब शुरु हुआ तो उसमें आने वाले लोगों का जमावड़ा होने लगा। इन विवाह समारोह में कोरोना से बचाव का पालन करने वाले कम तथा पालन न करने वालों के बीच विभाजन खुले तौर पर देखने को मिला। कुछ विवाह मंडपों का दौरा करने के बाद इस बात की पुष्टि हो गई कि लोगों के मन से अब कोरोना का भय दूर हो गया है।

 विवाह समारोह में कोरोना से बचाव संबंधी निर्देशों का पालन करने वालों की संख्या 20 प्रतिशत से ज्यादा नहीं दिखी, यानि नियमों का पालन करने वालों में 80 प्रतिशत ऐसे लोग थे, जिन्होंने नियमों की अनदेखी की। मॉस्क न लगाने वालों, सैनेटाइजर का उपयोग न करने वालों तथा सामाजिक दूरी को नज़रअंदाज करने वालों का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा दिखा, जो यह मान चुका है कि अब कोरोना महामारी पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है। 

कोरोना ने जब पहली बार दस्तक दी थी, उस वक्त सरकारी अधिकारी, विभिन्न विभागों के अधिकारियों तथा कर्मचारियों,  डॉक्टरो, सफाई कर्मचारियों, पुलिस विभाग से जुड़े लोगों ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर कोरोना महामारी को फैलने से काफी हद तक रोकने में सफलता प्राप्त की थी।  कोरोना पर काबू में रखने में सभी कोरोना योद्धाओं का अहम योगदान रहा। वैक्सीन आने ओर कोरोना पर काफी हद तक नियंत्रण पाने की स्थिति में लोगों को दी गई राहत में जब लापरवाही की जुगलबंदी हुई तो हालात बिगड़े और कोरोना की दूसरी लॉट शुरु हुई। बाजार में बिना मॉस्क के घूमते वक्त अगर भीड़ में से कोई एक व्यक्ति कोरोना प्रभावित रहा तो उससे कितने लोगों को कोरोना अपने प्रभाव में लेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। कोरोना को लेकर लापरवाही बरतने वालों को सदैव इस बात का ध्यान रखना होगा कि जिन लोगों ने कोरोना की पहली दस्तक में जो वेदनाएं सहन की हैं, वे वेदनाएं दूसरे चरण के कोरोना महामारी के फैलाव में न हो। 

जहां भी रहें कोरोना के आक्रमण से दूर रहने की रणनीति अपनानी होगी और जहां तक जुर्माने का सवाल है चाहे नेता हो, मंत्री हो या फिर सामान्य जनता सभी के साथ समान नीति अपनायी जानी चाहिए, अन्यथा नियमों का पालन न करने पर नागरिकों से जुर्माना वसूला जाता रहेगा और नेता इधर-उधर घूम-घूम कर कोरोना का पावर बढ़ाते रहेंगे, इसलिए अगर कोरोना को मात देनी है तो चाहे नेता हो या आम जनता हर किसी से साथ समान नीति अपनाना बेहद जरूरी है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो पूरे राज्य को एक बार फिर तालाबंदी का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, यह उनके अपने विचार हैं।)  

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