' लीओ ' की जीत हमारी हार है।

 Mumbai
' लीओ ' की जीत हमारी हार है।

भारतीय मूल के लिओ वारडकर आयरलैंड के पहले गे प्रधानमंत्री बन गए है। पूरी दुनिया में उनकी जीत का जश्न मनाया जा रहा है। और चूंकी लिओ का परिवार भारत से तालुख्ख रखता है इसलिए भारत में को लीओ की जीत को एक जश्न के रुप में मनाया गया। जिस दिन लिओ के जीत की घोषणा की गई ,उस दिन लिओ के परिवार के कई सदस्य मुंबई में लिओ के बहन के घर पर जमा हुए थे। लोग लिओ के प्रधानमंत्री बनने पर एक दुसरे को बधाईयां दे रहे थे। माहौल ऐसा बन गया था , मानो जैसे कोई भारतीय गोल्ड मेडल जीतकर भारत में वापस लौट रहा हो। खैर चूंकी बहुत कम भारतीयों को ही अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रौशन करने का मौका मिलता है। इसलिए लिओ की जीत का जश्न मनान स्वभाविक बात थी। लेकिन जिस तरह से हम भारतीय उनकी जीत को अपनी जीत मान रहे है क्या वो वाकई में मनाने लायक है? क्या हम वाकई इस काबिल है की उस देश के समाज के बरारबर खड़े हो सके जिस देश ने एक समलैंगिक को प्रधानमंत्री चूना? क्या हम उनके खुले सोच की वाह वाही कर अपनी संक्रीर्ण मानसिकता को छूपा सकते है?

लिओ वारडकर के परिवार का ताल्लुक भले ही भारत से हो लेकिन लिओ हमेशा से ही एक खुले समाज में रहते आए है। वो उस समाज में रहते आए है जहां किसी के गे होने या ना होने के शायद ही कोई फर्क पड़ता हो। वो उस देश में रहते आये है जहां पर गे होने की बात लोगों से छूपानी नहीं पड़ती है। लिओ ने कभी इस बात को नहीं छूपाया की वो गे है, और शायद उनकी यही साहसिकता आज उन्हे इस मुकाम पर ले आई है। कहते है नेता समाज का आईना होता है, जैसी प्रजा होती है राजा भी वैसा होता है, अगर ये बात सही है तो फिर हमे उस सामज से बहुत कुछ सिखने की जरुरत है जिसने एक भारतीय मूल के गे व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाया। वारडकर फैमिली 1960 में मुंबई से आयरलैंड आकर बस गई थी। जिसके बाद उनका भारत में सिर्फ आना जाना रहा।

आज भी हमारे देश में कई लोगों को ये बात छूपानी पड़ती है की वो गे या फिर ट्रांसजेंडर है। आज भी हमारा समाज उन लोगों को एक नीची निगाह से देखता है, समाज में उनके साथ समान व्यवहार नहीं किया जाता। भारत में देश की बात छोड़िये , अगर आज भी कोई भी श्ख्स अपने ही घर में ये बात बताता है की वो गे है या फिर ट्रांसजेडर , तो उसे या तो इस बात को छुपाने के लिए मजबूर किया जाता है, या फिर उसे घर से भगा दिया जाता है। भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां समलैंगिकता अब तक अपराध है। तो भला ऐसे समाज मे कोई किसी समलैगिंक को समाज में अपना नाम कमाने या फिर समाज कल्याण के कार्य करने का मौका क्यो दे। हां , अगर कोई समलैंगिक भारतीय किसी बाहर देश में अपने आप को एक उच्च स्थान पर स्थापित करें तो उसकी जीत का जश्न हम जरुर मनाते है। उसकी जीत को अपनी जीत बताते है, लेकिन कभी उस समाज की वास्तविकता को स्विकार नहीं करते जिस समाज ने उसे इतना बड़ा बनाया।

ऐसा नहीं है की हमारे समाज में इसके खिलाफ आवाज ना उठी हो । साल 2009 में जब दिल्ली हाई कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता के सेक्शन 377 को असंवैधानिक क़रार दिया था, तो समलैंगिक समुदाय की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा था। लेकिन 4 साल बाद साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध बताने वाली धारा 377 को फिर से जायज़ बताया। बावजूद इसके कई सोशल एक्टिविस्ट, फिल्म निर्माताओं ने इस विषय पर समाज को झकझोर देनेवाली फिल्मे बनाई। हंसल मेहता निर्देशित फिल्म 'अलीगढ़', शकुन बत्रा निर्देशित फिल्म 'कपूर एंड संस' और तनुज भ्रमर निर्देशित फिल्म 'डिअर डैड' कुछ ही ऐसी फिल्में हैं जिन्होंने गे किरदारों को अच्छी तरह से पेश किया है।                                                                     

( 2016 में रिलीज हुई फिल्म अलीगढ़ का एक दृश्य)

मुंबई बीएमसी चुनाव में भी कुर्ला इलाके से प्रिया पाटील नाम की ट्रांसजेंडर महिला ने चुनाव लड़ा , लेकिन वह हार गई। भारत में फिलहाल 2.5 मिलियन गे है। जो अभी भी अपने हक के लिए आवाज उठा रहे है। ये आकड़े तो सिर्फ दर्ज किये हुए आकडे़ है , पूरे देश में ऐसे कई लोग है जो खुल कर इस बारे में अपनी असलियत नहीं बता पाते। गे होना कई देशो में अपराध नहीं है। सबसे पहले डेनमार्क में 1989 में समलैंगिकता वैध की गई थी, और तब से अब तक सभी यूरोपीय देशों में इसे वैध घोषित कर दिया गया है। और शायद इन देशो के कानून के साथ साथ इन देशो के समाज ने भी इसे स्विकार कर लिया है।


क्या हम आज भी लिओ की जीत का जश्न मनाने के काबिल है? क्या हम उस समाज के बराबर खड़े रहे सकते है जिस समाज ने एक समलैंगिक को प्रधानमंत्री के पद पर बिठाया। गौरतलब है की उनके पूरे चुनाव प्रचार में गे होना मुद्दा रहा ही नहीं लेकिन अगर यही लिओ आज भारत के किसी इलाके से चुनाव लड़ रहे होते तो देश की भलाई की बात छोड़िये उन्हे अपनी समलैंगिता के बारे में बोलने के लिए ही दस बार सोचना पड़ता।


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