The Sky is Pink Review: रिश्तों का मायना सिखाती है प्रियंका-फरहान की यह फिल्म!

एक किताब को इमोशन्स के साथ फिल्म में तब्दील करना एक बड़ा टास्क होता है। इस टास्क को सोनाली बोस ने गंभीरता के साथ दर्शकों के सामने पेश कर दिया है।

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'मार्गरिटा विथ स्ट्रॉ' फिल्म से अपनी खास पहचान बना चुकीं नेशनल अवॉर्ड विनर फिल्म डायरेक्टर सोनाली बोस ने एक बार फिर अपनी फिल्म 'द स्काई इस पिंक' से लोगों के दबे हुए इमोशन्स को जगाने का काम किया है। इस फिल्म में प्रियंका चोपड़ा जोनस, फरहान अख्तर, जायरा वसीम और रोहित शराफ प्रमुख भूमिका में हैं। फिल्म में एक तरफ जहां खुशियां हैं वहीं दूसरी तरफ एक ऐसी गंभीर बीमारी जिससे आयशा का बचना नामुमकिन है। इन दोनों बिंदुओं को फिल्म में बेहतरीन तरीके से फिल्माया गया है।

हिरेन उर्फ पांडा (फरहान अख्तर) अदिति उर्फ मूस (प्रियंका चोपड़ा) दिल्ली में रहते हैं, दोनों अपनी लाइफ से खुश हैं। पर अगले ही पल इनकी लाइफ दुख के समंदर में डूबती है, जब अदिति को पता चलता है वह प्रेग्नेंट हैं। दरअसल इनको इससे पहले एक बेटी हुई थी, जिसे पल्मोनरी फाइब्रोसिस एक तरह की गंभीर बीमारी थी और जिसके चलते उसकी मौत हो जाती है। यह बीमारी अदिति और फरहान के जीन्स की वजह से हुई थी। अब वे नहीं चाहते थे कि और कोई बच्चा इससे सफर करे। पर होनी को कौन टाल सकता है। आयशा जन्म लेती है, उसी बीमारी का शिकार हो जाती है, पेरेंट्स उसे बचाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा देते हैं। दिल्ली से लंदन जाते हैं वहां किसी तरह पैसा जुटाकर आयशा का इलाज करवाते हैं। 13 साल के बाद आयशा दिल्ली वापस आती है, और उसे कीमो थैरेपी का साइड इफ़ेक्ट होता है। इसके बाद फॅमिली कई तरह के इमोशन्स और फीलिंग्स के साथ डील करती है, जिसके लिए आपको फिल्म देखनी होगी।

प्रियंका चोपड़ा लंबे वक्त के बाद किसी बॉलीवुड फिल्म में नजर आई हैं, पर हम उनकी यह दमदार वापसी कह सकते हैं। उन्होंने अपने किरदार को बड़ी ही बारीकी से पकड़ा है, एक एक इमोशन्स आप उनके चेहरे पर पढ़ सकते हैं। फरहान भी कम फिल्मों में नजर आते हैं, पर जब आते हैं तो छाप छोड़ जाते हैं। एक लड़के से लेकर एक पिता का किरदार उन्होंने बखूबी निभाया है। जायरा ने 'दंगल' और 'सीक्रेट सुपरस्टार' जैसी फिल्मों में काम करके पहले ही साबित किया है कि वे एक जबरदस्त एक्ट्रेस हैं। इस फिल्म में भी उन्होंने जान फूंक दी है। साथ ही रोहित सराफ ने एक फ्रेंडली भाई का किरदार बखूबी निभाया है।

एक किताब को इमोशन्स के साथ फिल्म में तब्दील करना एक बड़ा टास्क होता है। इस टास्क को सोनाली बोस ने गंभीरता के साथ दर्शकों के सामने पेश कर दिया है।

फिल्म का सेकंड हाफ काफी लंबा खींचा गया है, जिसे लगभग 20 मिनट कम किया जा सकता था। साथ ही फिल्म के गानों पर थोड़ा और काम किया जा सकता था।

इस वीकेंड पर अगर आप खाली हैं, तो परिवार के साथ इस फिल्म को देख सकते हैं। फिल्म देखते समय आपके दबे हुए इमोशन्स भी जाग जाएंगे और अपने पेरेंट्स को एक बार तो आप जरूर गले लगा लेंगे।

रेटिंग्स: 4/5

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