बीएमसी में उठा मुद्दा, जन्मजात बच्चों की श्रवण क्षमता की होनी चाहिए जांच


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बीएमसी सभा की बैठक में कांग्रेस की नगरसेवक संगीता हंडोरे ने मांग की है कि पश्चिमी देशो की तरह मुंबई में भी हियरिंग स्क्रीनिंग टेस्ट को अनिवार्य होना चाहिए। इसका आशय है कि जब बच्चा जन्म लेता है तो उसके सुनने की क्षमता की जांच होनी चाहिए, ताकि जाँच में कुछ कमी पायी जाती है तो तुरंत उसका इलाज किया जा सके। नगरसेवकों ने यह भी मांग कि कि इस जाँच के लिए अस्पतालों में अलग से यूनिट भी होनी चाहिए।

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भारत में आमतौर पर 10 से 12 हजार बच्चे जन्मजात मूकबधिर होते हैं या फिर उनमें सुनने की क्षमता कम होती है। जानकारी के अभाव में बच्चों के पैरेंट्स इस और कम ही ध्यान देते हैं अथवा वे इस बात से बिलकुल ही अनजान होते हैं कि उनके बच्चे में सुनने की क्षमता कम है। यह बात उन्हें तब पता चलती है जब बच्चा बोल नहीं पाता यानी कि जन्म से दो या तीन साल बाद। तब जाकर बच्चे के माता-पिता उसका इलाज करवाते हैं लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी होती है और परिणामस्वरुप बच्चा आजीवन मूक बधिर या कर्णबधीर हो जाता है, जिससे उसका जीवन भी प्रभावित होता है।      

इसे देखते हुए कांग्रेस की नगरसेवक संगीता हंडोरे ने मांग कि जब बच्चा जन्म लेता है तो उसका भी हियरिंग स्क्रीनिंग टेस्ट अनिवार्य होना चाहिए, ताकि कुछ कमी होने पर तुरंत उपचार हो सकेगा और अनेक बच्चे मूक बधिर होने से बच सकेंगे। हंडोरे ने आगे कहा कि इसका उपचार के कोक्लियर इम्प्लांट जरिये होना चाहिए और इसके लिए सभी अस्पतालों में अलग से यूनिट की स्थापना की जानी चाहिए। अब आगामी बीएमसी इस बाबत प्रशासन को एक प्रस्ताव भेजा जाएगा।


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