अब वेज कैप्सूल, कैप्सूल को बनाने में होता है जानवरों का इस्तेमाल

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अब वेज कैप्सूल, कैप्सूल को बनाने में होता है जानवरों का इस्तेमाल

लोगों की धार्मिक भावनाए आहत न हो इसीलिए अब लोगों को वेजिटेरियन कैप्सूल खाने को मिलेंगी। केंद्र सरकार भी इस प्रयास में जुट गई है। यह फैसला केंद्रीय महिला एंव बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी द्वारा स्वास्थ्य मंत्रालय को 'जिलेटिन कैप्सूल' की जगह पौधों से बने कैप्सूल के इस्तेमाल के सुझाव के बाद लिया गया।

मुंबई के जनआरोग्य अभियान के उमेश खके ने कहा कि दवा के रूप में यूज की जाने वाली कैप्सूल को जिलेटिन कैप्सूल कहते हैं। जिलेटिन कैप्सूल जीव-जंतुओं से प्राप्त उत्पादों में मिलने वाले कोलोजन से बनाए जाते हैं। वर्तमान में करीब 95 प्रतिशत दवा कंपनियां पशुओं के उत्पादों से बनने वाले जिलेटिन कैप्सूल का इस्तेमाल करती हैं। पौधों से बनने वाले कैप्सूल प्रमुखतया केवल दो कंपनियां बनाती हैं। इनमें से एक भारत स्थित एसोसिएट कैप्सूल है और दूसरी अमेरिकन कैप्सुगल। पशुओं के ऊतक, हड्डियां और त्वचा को उबालकर जिलेटिन प्राप्त किया जाता है।

इंडियन फार्मासिटीकल एसोसिएशन की उपाध्यक्ष डॉ. मंजिरी घरत ने बताया कि पिछले डेढ़ वर्षों से इस विषय पर चल रहे शोध की केंद्र सरकार ने सूचना मंगाई है। यही नहीं पिछले सप्ताह इसी मुद्दे पर केंद्र सरकार की एक अहम बैठक भी हुई साथ ही सरकार इस योजना को लेकर काफी सकारत्मक भी है, जल्द ही सोल्युलोज से बने कैप्सूल मरीजों के लिए उपलब्ध होंगे।

लेकिन इस विषय पर दवा क्षेत्र के जानकारों के अनुसार पौधों पर आधारित कैप्सूल के लिए मानक नियमन का अभाव है। इसके अलावा भारत में पौधों पर आधारित कैप्सूल जिलेटिन आधारित कैप्सूल से दो-तीन गुना महंगे होते हैं।


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