माफिया डॉन अरुण गवली की उम्रक़ैद की सजा रहेगी बरकरार

इस उम्र कैद के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर की गयी थी, लेकिन सोमवार को हुई सुनवाई में गवली को झटका लड़ा और कोर्ट ने गवली की मांग खारिज कर दी।

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने माफिया डॉन अरुण गवली की उम्रक़ैद को बरकरार रखा है। गवली को साल 2008 में हुए शिव सेना नगरसेवक कमलाकर जामसांडेकर मर्डर मामले में महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून (मकोका) के तहत निचली अदालत द्वारा 2012 में उम्र कैद की सजा सुनाई गयी थी, लेकिन इस सजा के खिलाफ याचिका दायर की गयी थी। जिसकी सुनवाई में सोमवार को कोर्ट ने यह आदेश दिया।

इस सुनवाई में न्यायमूर्ति बी. पी. धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति स्वप्ना जोशी की खंडपीठ ने पूर्व विधायक गवली के साथ ही इस अपराध में शामिल उसके कुछ अन्य सहयोगियों की सजा की भी पुष्टि की।

क्या था मामला?
मार्च 2008 में मुंबई के असल्फा इलाके रहने वाले शिव सेना के नगरसेवक कमलाकर जामसंडेकर की हत्या गवली द्वारा भेजे गए कुछ हमलावरों ने कर दी थी। पुलिस जांच में पता चला कि इस हत्या के लिए गवली ने 30 लाख रुपए की सुपारी ली थी। जिसके बाद गवली को गिरफ्तार कर लिया गया। उस पर मुकदमा चला और 2012 में विशेष अदालत ने उसे उम्र कैद की सजा सुनाई। इसी मामले में कोर्ट ने गवली सहित 10 अन्य लोगों को भी उम्र कैद सहित 14 लाख रुपए का दंड की सजा सुनाई थी। तभी से लेकर अब तक माफिया डॉन जेल में है और वर्तमान में वह नागपुर सेंट्रल जेल में बंद है। 

इस उम्र कैद के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर की गयी थी, लेकिन सोमवार को हुई सुनवाई में गवली को झटका लड़ा और कोर्ट ने गवली की मांग खारिज कर दी।

क्यों हुई थी हत्या? 
बताया जाता है कि शिव सेना नगरसेवक कमलाकर जामसांडेकर का सम्पत्ति को लेकर सदाशिव सुर्वे नामके व्यक्ति के साथ विवाद चल रहा था। सदाशिव सुर्वे ने जामसांडेकर को रास्ते से हटाने का निर्णय लिया और इसके लिए गवली से मुलाकात की।गवली ने यह काम करने के लिए सुर्वे से 30 रुपए की मांग की, जिसे सुर्वे ने मान लिया।

जामसांडेकर को मारने के लिए गवली ने अपने शार्प शूटर प्रताप गोडसे को इसकी सुपारी दी। 2 मार्च 2008 के दिन जामसांडेकर जब अपने घर में थे तभी गोडसे और उसका एक अन्य सहयोगी  जामसांडेकर के घर में घुस गए और उसे गोलियों से छलनी कर फरार हो गए।

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