बाजारों में 'गुड़ी' से लौटी रौनक

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बाजारों में 'गुड़ी' से लौटी रौनक
बाजारों में 'गुड़ी' से लौटी रौनक
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परेल - गुड़ी पड़वा के उपलक्ष्य में बाजार सज गए हैं। परेल के भोइवाड़ा बाजार में लाल, पीला, हरा जैसे कई रंगों के छोटे बड़े आकर्षक इको फ्रेंडली गुड़ी बिक रहे हैं।

शहरों में बढ़ती आबादी के कारण गुड़ी बनाने के लिए जगह की कमी हो रही है। ईसीलिए बाजारों में अब रेडीमेड गुड़ी पडवा बिक रही है। बाजारों में बिकने वाली रेडीमेड गुड़ी पड़वा की गुड़ी तांबा और रेशमी कपड़े की बनाई जाती है। जबकि घरों में बनने वाली गुड़ी नई साड़ी, गुड़ी के लिए बांस, पूजा के लिए लगने वाली सामग्री का खर्च मिलकर रेडीमेड गुड़ी से काफी महंगे पड़ जाते हैं इसीलिए अधिकांशतः लोग रेडीमेड गुड़ी ही खरीद रहे हैं. बाजारों में गुड़ी की कीमत 60 रूपये से लेकर 300 रूपये तक है।

गुड़ी बेचने वाली रेणुका ने बताया कि घरों में बड़ी गुड़ी को खिड़की पर नहीं लगा सकते इसीलिए अब छोटी गुड़ी भी बनाई जा रही है, जो कि ग्राहकों को काफी पसंद भी आ रही है।

आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में भी मनाते हैं लोग 

बता दें कि चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा मनाया जाता है। इस दिन हिन्दु नववर्ष का आरम्भ होता है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में सारे घरों को आम के पेड़ की पित्तयों के बंदनवार से सजाया जाता है। सुखद जीवन की अभिलाषा के साथ-साथ यह बंदनवार समृद्धि, व अच्छी फसल के भी परिचायक हैं। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को महाराष्ट्र में गुड़ीपड़वा कहा जाता है।

आध्यात्मिक महत्व

कहा जाता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। इसमें मुख्यतया ब्रह्माजी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गंधवारें, ऋषि-मुनियों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों का ही नहीं, रोगों और उनके उपचारों तक का भी पूजन किया जाता है। इसी दिन से नया संवत्सर शुंरू होता है। अत इस तिथि को ‘नवसंवत्सर‘ भी कहते हैं। चैत्र ही एक ऐसा महीना है, जिसमें वृक्ष तथा लताएं पल्लवित व पुष्पित होती हैं।

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