खतरनाक इमारत कह कर घर से निकला, अब ट्रांजिट कैंप में गुजार रहे नरक की जिंदगी

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खतरनाक इमारत कह कर घर से निकला, अब ट्रांजिट कैंप में गुजार रहे नरक की जिंदगी

घाटकोपर में मंगलवार को इमारत गिरने से 7 लोगों ने अपनी जान गंवाई जिनमें एक छोटा बच्चा भी है। इस दुर्घटना के बाद एक बार फिर से धोखादायक इमारतों पर सवाल उठ रहे हैं, आखिरकार बार-बार इस तरह के हादसे क्यों हो रहे हैं और इसका जिम्मेदार कौन है? वैसे इसका जिम्मेदार म्हाडा का इमारतों के प्रति उदासीन रवैया माना जा रह है।

हर साल की तरह म्हाडा की मरम्मत और पुनर्निर्माण बोर्ड ने इस बार भी महीने के आखिरी हफ्ते में अति धोखादायक इमारतों की लिस्ट जारी की थी। यही नहीं इस बारे में जून महीने के पहले हफ्ते में गृहनिर्माण मंत्री प्रकाश मेहता और गृहनिर्माण राज्यमंत्री रवींद्र ने एक प्रेस शो में इस बात की घोषणा की थी कि खतरनाक हो चुकी इमारतों में रहने वालों को ट्रांजिट कैम्प में रखा जाएगा। इस पर अमल करते हुए मुंबई की 9 इमारतों के 500 परिवार के लगभग 218 परिवार वालों को ट्रांजिट कैंप में भेजा गया था। उसके बाद से बाकी बचे लोगों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

इस खबर के बारे में मुंबई लाइव ने शुरू से ही फॉलोअप लेते हुए म्हाडा की मरम्मत और पुनर्निर्माण बोर्ड के पास अपडेट लेता रहा, यही नहीं महिना भर पहले ही इस बोर्ड के मुख्य अधिकारी सुमंत भांगे ने मुंबई लाइव से बात करते हुए आश्वासन दिया था कि जल्द ही बाकी बचे लोगों को भी ट्रांजिट कैंप में स्थान्तरित किया जाएगा। 

जब बिल्डिंगों से लोगों को निकला गया तो लोगों ने निकलने से इनकार कर दिया। इसके लिए पुलिस बल भी मंगाई गई थी,लेकिन उस पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गयी। अभी कुछ दिन पहले ही बोर्ड की तरफ से इन लोगों को बिजली और पानी कनेक्शन काटने का नोटिस भी भेजा गया। अगर इन इमारतों में से कोई इमारत हादसे का शिकार हो जाती है तो इसका जिमेदार कौन होगा। जब इस बारे में अधिकारियों से पूछा गया तो उन्होंने उलटे रहिवासियों पर ही ठीकरा फोड़ते हुए कहा कि जब तक वे घर खाली नहीं करते तब तक हम कुछ नहीं कर सकते।


इस बारे में ट्रांजिट कैंप के अध्यक्ष अभिजित पेठे ने सफाई पेश करते हुए कहा कि मरम्मत बोर्ड ने दक्षिण मुंबई में अभी तक ट्रांजिट कैंप नहीं बनाया है, जबकि गोराई में ट्रांजिट कैंप है। साथ ही उन्होंने आगे कहा कि ट्रांजिट कैंप में गए लोग कई सालों से रह रहे हैं उन्हें अभी तक घर नहीं मिला है। बकौल अभिजीत उन्हें 30 साल का अनुभव है कि म्हाडा का ट्रांजिट कैंप मतलब किसी नरक से कम नहीं है।

अभिजीत पेठे, अध्यक्ष, ट्रांजिट कैंप एसोसिएशन


एक आंकडें के अनुसार 1971 से 2017 तक हादसे का शिकार इमारत की संख्या कई है। इन हादसों में अब तक लगभग 777 लोगों की जान जा चुकी है जबकि 1868 जख्मी हुए हैं। यह सिलसिला कहाँ जाकर रुकेगा अभी भी इसका जवाब किसी के पास नहीं है।


उपकार प्राप्त इमारतों की मरम्मत के लिए म्हाडा और मालिको की तरफ से लापरवाही बरती जाती है। इस हादसों का जिम्मेदार सीधे तौर पर सरकार ही है। ट्रांजिट कैंप में रहने वाले लोग कई सालों से रह रहे हैं, उन्हें उनका मकान कब मिलेगा कोई कुछ नहीं कह सकता। म्हाडा के कब्जे वाली इमारतों को 33(7) के अंतर्गत पुनर्विकास होने की जरुरत है लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है।  

प्रकाश रेड्डी, अध्यक्ष, मुंबई भाडेकरु संघ


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