आगे की राह और भी कठिन है देवेंद्र फड़णवीस के लिए!

देवेंद्र फड़णवीस को 30 नवंबर तक बहुमत साबित करना है।

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राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने एक बार फिर से नये मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले ली।  देवेंद्र फड़णवीस के नये सरकार में एनसीपी के अजित पवार को उपमुख्यमंत्री बनाया गया है। देवेंद्र फड़णवीस के फिर से मुख्यमंत्री बनने के बाद पूरे राज्य में बीजेपी कार्यकर्ताओं में एक बार फिर से जोश आ गया है।  जगह जगह पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस के पोस्टर लगा दिये गए है। बीजेपी कार्यकर्ताओं ने जश्न भी मनाना शुरु कर दिया है। लेकिन इस बार देवेंद्र फड़णवीस की राह इतनी आसान नहीं होगी। देवेंद्र फड़णवीस का इम्तिहान अब शुरु होने जा रहा है क्योकी अभी तक उन्होने सिर्फ राज्यपाल के सामने विधायको के समर्थन का पत्र दिया है लेकिन उन्हे अब फ्लोर टेस्ट से भी गुजरना है।

30 नवंबर को फ्लोर टेस्ट

राज्यपाल को विधायको के समर्थन की चिठ्ठी देने के बाद देवेंद्र फड़णवीस ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली । राज्यपाल ने देवेंद्र फड़णवीस को अपना बहुमत साबित करने के लिए 30 नवंबर तक का समय दिया है।  यानी की 30 नवंबर तक देवेंद्र फड़णवीस को अपना बहुमत साबित करना है। राज्य में कुल विधायको की संख्या 288 है और बहुमत के लिए बीजेपी को 145 विधायको का समर्थन चाहिये। बीजेपी के पास अपने खुद के 105 विधायक है , कई और निर्दलिया विधायकों ने भी अपना समर्थन बीजेपी को दिया है। 

निर्दलिय विधायकों को मिलाकर 119 विधायक

राज्य बीजेपी अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने पहले ही एक प्रेस कॉफ्रेस में कहा था की बीजेपी के पास 105 विधायक और निर्दलिय विधायको के समर्थन को मिलाकर बीजेपी के पास मौजूद कुल विधायको की संख्या 119 तक पहुंच जाती है।  यानी इसके बाद भी बीजेपी को सरकार बनाने के लिए 26 और विधायको की जरुरत पड़ेगी।  

एनसीपी के विधायको पर निर्भर

बीजेपी के पास अपने खुद के दमपर 119 विधायक है। सरकार बनाने के लिए बीजेपी को 145 का आकड़ा छूना है यानी की 26 और विधायको की जरुरत बीजेपी को पड़ेगी।बताया जा रहा है की अजित पवार के साथ 20 से 22 विधायक बीजेपी को अपना समर्थन दे सकते है। फिर भी बीजेपी के 119 और एनसीपी के 22 विधायको को मिलाकर ये आकड़ा 141 तक पहुंचता है, यानी की चार और विधायको की जरुरत बीजेपी को पड़ेगी। लिहाजा ये विधायक या तो शिवसेना , एनसीपी या फिर कांग्रेस के होंगे या फिर शिवसेना को समर्थन करनेवाले किसी और छोटी पार्टी के। 

दो तिहाई सदस्यों की रज़ामंदी जरुरी

अगर एनसीपी के 20 से 22 विधायक बीजेपी को अपना समर्थन देते है तो उनपर दल बदल विरोधी कानून लागू हो जाएगा।  दल बदल विरोधी कानून के अनुसार उनकी विधानसभा की सदस्यता रद्द हो जाएगी। सदस्या रद्द होने के बाद ये विधायक फ्लोर टेस्ट में हिस्सा नहीं ले सकते। किसी पार्टी के अगर दो तिहाई विधायक उस पार्टी से इस्तिफा देकर किसी और पार्टी के साथ जाते है तो उनपर दलबदल कानून नहीं लगता।

विधायकों के इस्तीफा देने पर बहुमत सिद्ध करने की संख्या हो जाएगी कम

अगर 20 से 22 विधायक पार्टी से इस्तीफा दे देते है तो ऐसी स्थिती मे बहुमत सिद्ध करने का आकड़ा 266 विधायको के हिसाब से 134 हो जाएगा ।तो ऐसी स्थिती में बीजेपी राज्य के छोटे छोटे पार्टियों और निर्दलिय विधाय़को के सहारे सरकार बना सकती है।

क्या है दलबदल कानून

भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची को दल बदल विरोधी कानून कहा जाता है। इसे 1985 में 52वें संशोधन के साथ संविधान में शामिल किया गया था।  इस कानून के तहत-कोई सदस्य सदन में पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करे/ यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से त्यागपत्र दे/ कोई निर्दलीय, चुनाव के बाद किसी दल में चला जाए/ यदि मनोनीत सदस्य कोई दल ज्वाइन कर ले तो उसकी सदस्यता जाएगी।1985 में कानून बनने के बाद भी जब अदला बदली पर बहुत ज्यादा शिकंजा नहीं कस पाया तब इसमें संशोधन किए गए। इसके तहत 2003 में यह तय किया गया कि सिर्फ एक व्यक्ति ही नहीं, अगर सामूहिक रूप से भी दल बदला जाता है तो उसे असंवैधानिक करार दिया जाएगा। इसके अलावा इसी संशोधन में धारा 3 को भी खत्म कर दिया गया जिसके तहत एक तिहाई पार्टी सदस्यों को लेकर दल बदला जा सकता था। अब ऐसा कुछ करने के लिए दो तिहाई सदस्यों की रज़ामंदी की जरूरत होगी।

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