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MVA सरकार की डगमगाती नाव को पार लगाते उद्धव ठाकरे!

राजनीतिक पंडितों का यह भी कहना है कि नौसिखिए उद्धव ठाकरे को प्रसाशनिक गुर सिखाने वाले कई साल का अनुभव लिए NCP प्रमुख शरद पवार (sharad pawar) हैं।

MVA सरकार की डगमगाती नाव को पार लगाते उद्धव ठाकरे!
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शनिवार 28 नवंबर 2020 को महाराष्ट्र की MVA सरकार के एक साल पूरे हो गए। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव (maharashtra assembly election) के बाद भाजपा (bjp) के साथ लंबी चली खींचतान के बाद शिवसेना (shivsena) ने भाजपा का साथ छोड़ कर NCP और कांग्रेस (congress) के सहयोग से सरकार बनाई। उन्होंने पिछले वर्ष 28 नवंबर को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। जब इस सरकार का गठन हुआ था, तो इसमें शामिल पार्टियों (शिवसेना, NCP, कांग्रेस और अन्य) को देखते हुए तमाम राजनीतिक विशेषज्ञों और पंडितों ने इसे केर-बेर की सरकार बताते हुए कभी भी टूट सकने वाली कहा था।

महाविकास अघाड़ी के लिए पिछला एक साल काफी चुनौतियों भरा भी रहा है। लेकिन सरकार के मुखिया उद्धव ठाकरे (uddhav thackeray) ने अभी तक जिस तरह से काम कर रहे हैं उसे देखकर राजनीतिक विश्लेषकों की राय अब बदल रही है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने जिस तरह से कोरोना महामारी, मराठवाडा इलाके में बाढ़ और सूखा, निसर्ग तूफान प्राकृतिक आपदाओं जैसी चुनोतियों के बीच काम किया है उससे उन्होंने अपने आप को साबित ही किया है और सत्ता पर उनकी पकड़ मजबूत हुई है।

जानकारों का यह भी कहना है कि, जिस तरह से उद्धव अलग अलग विचारधाराओं वाली पार्टी के मुखिया बन कर सभी को साथ लेकर चले, वह वाकई में कबिलेतारीफ है।

कोरोना (Coronavirus) काल में जिस तरह से रेलवे से समन्वय स्थापित कर श्रमिक ट्रेनों के माध्यम से लाखों श्रमिक मजदूरों (migrant workers) को उनके गृहनगर छोड़ा गया वह उनकी कुशल राजनीति का परिचायक ही है। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी (Corona19 pandemic) को लेकर जिस तरह से उन्होंने मुंबई (mumbai) जैसे एक सघन और अंतरराष्ट्रीय शहर को संभाला उसकी प्रशंसा न केवल देश भर में हुई बल्कि दुनिया भर के कई देशों ने इस मॉडल को अपनाया। यहां तक कि विश्व स्वास्थ्य संगठन(who) ने भी इसकी तारीफ की। काफी धैर्य के साथ काम लेना, जनता को कोरोना काल में विश्वास में लेना उनके अच्छे कार्यों में से एक ही गिना जाएगा, वर्ना दिल्ली का हाल तो सब देख ही रहे हैं।

हालांकि बीच बीच में एमवीए सरकार (mva government) की स्थिरता को ले कर भी कई बार कयास लगाए जाने लगे थे, लेकिन शिवसेना द्वारा यही कहा जा रहा था कि, राज्य की एमवीए सरकार को कोई खतरा नहीं हैं और यह तभी गिरेगी जब तीनों में से कोई एक पार्टी बाहर होगी।

इसके अलावा अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या (sushant singh rajput suicide) की जांच को लेकर चाहे उनपर सवाल उठे हो या अभिनेत्री कंगना रनौत (kangana ranaut) का ऑफिस तोड़वाने को लेकर सरकार की किरकिरी हुई हो, हर जगह उद्धव मजबूती के साथ खड़े नजर आए।

यही नहीं पालघर (palghar) में दो साधुओं की पीट-पीट कर हत्या का मामला हो या अभिनेता सुशांत सिंह की मौत का मामला राजनीतिक सुर्खियां बने रहना और इस मामले में उनके बेटे और पर्यावरण मंत्री आदित्य ठाकरे (aditya thackeray) का नाम आना। उन्होंने कहीं भी इस पर टिप्पणी न करके एक परिपक्व राजनेता होने का सबूत ही दिया।

हालांकि, इस दौरान मुख्यमंत्री पर घर से काम करने के आरोप भी लगे, लेकिन उद्धव इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि, सूबे के मुखिया होने के साथ साथ एक जिम्मेदार नागरिक भी होने के कारण अगर वो लोगों के बीच खुद उदाहरण पेश नही करेंगे तो आम लोगों से कोरोना प्रोटोकॉल फॉलो करने की अपील करना बेमानी ही होगी।

राजनीतिक पंडितों का यह भी कहना है कि नौसिखिए उद्धव ठाकरे को प्रसाशनिक गुर सिखाने वाले कई साल का अनुभव लिए NCP प्रमुख शरद पवार (sharad pawar) हैं।

शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस की गठबंधन वाली एमवीए सरकार ने अगर अपना एक वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया है तो इसका श्रेय उद्धव ठाकरे के साथ साथ शरद पवार को भी जाता है।

हालांकि ये भी आरोप लगते रहें हैं कि सहयोगी दलों के बीच समन्वय की कमी है। लेकिन गठबंधन की सरकार की मजबूरियों को उद्धव अच्छी तरह से जानते हैं। और उद्धव को यह अच्छी तरह से पता है कब, कहाँ कैसे बोला जाना चाहिए।

गठबंधन की इन्हीं मजबूरियों का हवाला देते हुए बीजेपी MVA सरकार को पूरी तरह से फेल सरकार बताती है। BJP विधायक राम कदम (bjp mla ram kadam) का कहना है कि, MVA सरकार केवल ट्रांसफर करवाने की सरकार है। इस सरकार ने अभी तक केवल बदली करवाने के अलावा और किया भी क्या है। 

कदम (ram kadam) आगे कहते हैं कि, कोरोना काल में जिस तरह से स्थिति बद से बदतर हो गई, उसके लिए यह सरकार ही जिम्मेदार है।जनता की भलाई के लिए कोई काम नहीं किया है।

खैर विपक्ष अपना काम कर रहा है और सत्ता पक्ष अपना। लेकिन एक तो यही कहा जायेगा कि,, जिस तरह से लोगों ने इस नई सरकार से उम्मीदें की थीं, अगर उस पर ये अगर खरा भी नहीं उतरे हैं तो कोई ऐसी आलोचना वाली बात भी नहीं है। वर्ना राजनितिक अस्थिरिता के बीच इस महंगाई में जनता इतनी जल्दी एक और चुनाव देखने के मूड में तो कतई नहीं थी।

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