नारायण राणे... गुलदस्ता...और तीर कमान ।

 Mumbai
नारायण राणे... गुलदस्ता...और तीर कमान ।

मुंबई- बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह वरिष्ठ काँग्रेस नेता नारायण राणे को उनके जन्मदिन के उपलक्ष्य पर तोहफे के तौर पर ‘कमल’पुष्प दे सकते हैं। पार्टी की तरफ से नारायण राणे को कमल पुष्प देनेपर एक राय बनती दिख रही हैं। 10 अप्रैल को नारायण राणे का जन्मदिन हैं। बीजेपी की तरफ से मिलनेवाला तोहफा स्वीकारना हैं या तीरकमान लेकर नीजी राजनैतिक विकास के मार्ग में आनेवाली बाधाओं को खत्म करना हैं, इस बातपर राणे विचारमंथन कर रहे हैं। इन दिनों राणे सिंधुदुर्ग जिले के कणकवली में हैं, जहां उन्होंने अपने बडे पुत्र पूर्व सांसद निलेश राणे को बुलावा भेजा हैं। निलेश पिछले कुछ दिनों से रत्नागिरी में कार्यकर्ताओं के साथ मेल-मिलाप कर रहे हैं। राणे के दुसरे पुत्र विधायक नितेश राणे भी पिता के बुलावेपर कणकवली पहुंच गए हैं। जन्मदिन पर राजनैतिक मैदान में आतिषबाजी करने के लिए राणे परिवार तैयार हो गया हैं।

कोकण में अपने पुराने कार्यकर्ताओं की राय जानने के काम में नारायण राणे जुट गए है। कमल पुष्प या तीरकमान? सवाल के जवाब में अधिकतर कार्यकर्ता तीरकमान की तरफ अपना रुझान बता रहे हैं। कार्यकर्ताओं का मत जानने के साथसाथ खुद के राजनैतिक फायदे को तर्जी देना राणे कैसे भूल सकते हैं? कमलपुष्प का स्वीकार करने के बाद कोकण में उनके कार्यकर्ताओं के उत्साह का तालाब सूख जाना स्वाभाविक हैं, लेकिन यह बात भी दरकिनार नहीं की जा सकती कि, ऐसा होने की स्थिती में राणे को राजनैतिक करियर संवर जाएगा। अगर तीर-कमान थामते हैं तो यकीनन कार्यकर्ताओं में उनकी लोकप्रियता बढ जाएगी।

राणे अगर कमलपुष्प की सौगात स्वीकार कर लेते हैं तो आज कमलपुष्प कसकर थामकर बैठे राजन तेली, काका कुडालकर, संदेश पारकर जैसे कभी राणे के कट्टर समर्थक और अब कट्टर राजनैतिक दुश्मनी निभानेवाले नेता तीर-कमाल थामने के लिए मजबूर हो जाएंगे। अगर राणे तीर-कमान की प्रत्यंचा खींचने की कोशिश करते हैं तो राज्य के पिछले कई महिनों से मौके की तलाश में बैठे वित्त राज्यमंत्री दीपक केसरकर और राणे को विधानसभा चुनाव में हार का स्वाद चखानेवाले विधायक वैभव नाईक को कमल की ओर कदम बढाने का मौका मिल ही जाएगा। यह बात और हैं कि, राणेपर उलझनवाली स्थिती हावी न हो, इस बात का खयाल उन्हे अपनी ओर खींचनेवाले लेंगे, क्यूंकि इसमें उनका भी फायदा हैं। अब ‘कमल’ सुंघना हैं, ‘तीर-कमान’ पर पकड बनानी हैं या कार्यकर्ताओं को संयम रखने की गुजारिश करते हुए ‘हाथ’ दिखाना हैं, यह राणे को तय करना हैं। राजनीति का पूर्वअनुभव देखते हुए अमल में लाए हुए हर निर्णय का दायित्व नारायण राणे को उठाना होगा और संघर्ष के आदि हो चुके राणे इसे उठाकर रहेंगे।

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