वर्ली में क्या होगा शिवसेना का ?

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वर्ली - रेसकोर्स और धोबीघाट के कारण अपनी पहचान बनाने वाला विधानसभा क्षेत्र वर्ली चुनावी समीकरण के कारण आजकल चर्चा का विषय बना हुआ है। वर्ली विधानसभा में शिवसेना का तिकड़ी के आपस में रार होने से शिवसैनिकों के लिए यहां काफी असमंजस की स्थिति व्याप्त है। शिवसेना के वर्तमान विधायक सुनील शिंदे, वर्ली विधानसभा के अध्यक्ष आशीष चेम्बूरकर और नगरसेविका किशोरी पेडणेकर के अलग अलग गुटों के कारण शिवसेना यहां बटी नजर आ रही है।

एक समय यहां कांग्रेस का एकछत्र राज था। कांग्रेस नेता भाऊराव पाटिल ने इस विधानसभा में कांग्रेस का झंडा फहराया था। कांग्रेस के ही नेतृत्व में यहां शरद दिघे, शरद कोरगांवकर जैसे नेताओं ने कांग्रेस के राज करने की परंपरा को आगे बढ़ाया, लेकिन यह परंपरा अधिक दिनों तक नहीं टिक पायी। 80 के दशक में कांग्रेस को पराजय का मुंह देखना पड़ा।

कामगार नेता दत्ता सामंत की अगुवाई में कामगार आघाड़ी उम्मीदवार ने जीत हासिल की लेकिन बदलते परिवेश में धीरे धीरे उनकी भी पकड़ कमजोर होती गयी और शिवसेना अपना प्रभाव जमाने लगी। इसी बीच राकांपा के सचिन अहीर ने भी शिवसेना के तूफ़ान को रोकते हुए अपनी पहचान बनाई। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में विधायक सुनील शिंदे ने एक बार फिर से जीत दर्ज कर बाजी को पलट दिया। लेकिन अब शिवसेना नेताओं के बीच आपस में कलह होने से यहां शिवसेना यहां बिखरी नजर आ रही है।

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