मुझे परिभाषित करने की जरूरत क्यों ?

मुंबई - महिला और पुरुष के बीच किसी एक को परिभाषित करना कहां तक सही है? क्या इसकी जरूरत है?  आखिर यह भेदभाव क्यों? बिना महिलाओं की स्थिति में सुधार के इस संसार का कल्याण संभव नहीं है, जैसे किसी पक्षी के लिए एक पंख से उड़ना असंभव है। यह विचार स्वामी विवेकानंद ने रखा था। आज हम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं। हम अक्सर कहते रहते हैं और आज के दिन भी कह रहे हैं कि महिलाओं की स्थिति बदल चुकी है। पर क्या सच्चे अर्थों में महिलाओं की स्थिति बदल गई है ? क्या समाज का हरेक वर्ग महिला को सम्मान देने लगा है ? हम ये नहीं कहेंगे कि महिलाओं की स्थिति में बदलाव नहीं आए हैं, पर यह बदलाव काफी कम है, हमारा समाज आज भी मानने से संकोच कर रहा है कि महिला समाज का एक अभिन्न अंग है, महिला के बिना समाज की कल्पना असंभ है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर मुंबई लाइव ने कुछ महिलाओं से बात की और उनकी स्थिति के बारे में जानने की कोशिश की, उनकी सच्ची स्थिति जाने के लिए देखें यह पूरा वीडियो।


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