आरटीई बना ‘राइट टू इनकार’

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आरटीई बना ‘राइट टू इनकार’
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मुंबई  -  

मुंबई – गरीब बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले इसके लिए उनका भी दाखिल अच्छे स्कूलों में होना चाहिए, इस संबंध में सरकार की तरफ से राइट टू एजुकेशन यानी (आरटीई) कानून बनाया गया था। लेकिन इस कानून का जमीनी स्तर पर कितना क्रियान्वन हो रहा है इसकी एक बानगी एक आंकड़े के जरिए स्पष्ट होती है।

मिली जानकारी के अनुसार पहले चरण में करीब 334 स्कूलों में 8593 सीटें उपलब्ध थी जिनमें से मात्र 1996 सीटों पर ही एडमिशन हुआ, बाकी बचे 6597 सीटें खाली हैं। इससे साफ स्पष्ट है कि कई स्कूल सरकार की इस योजना को पूरा करने में उदासीन रवैया अपना रहे हैं। हालांकि यह आंकड़ा अभी पहले चरण का ही है। इसे मिलाकर अप्रैल तक कुल चार चरण होने हैं। लेकिन पहले चरण के एडमिशन को देख कर आशंका जताई जा रही है कि आने वाले अन्य तीन चरणों में भी एडमिशन में वृद्धि हो! पिछले वर्ष प्री प्राइमरी स्कूलों में एडमिशन के लिए जहां 12 हजार सीटें उपलब्ध थी तो वहीं इस साल लगभग स्कूलों ने 3 हजार सीटेंं कम की है।

इस संबंध में अनुदानित शिक्षा बचाव समिति के सलाहकार सुधीर परांजपे ने आरोप लगाते हुए कहा कि स्कूलों ने जानबूझकर सीटों में कमी की है। उन्होंने आरोप लगाते हुए आगे कहा कि एडमिशन प्रक्रिया में अनेक त्रुटियां हैं जिनपर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। सरकार को इस सम्बन्ध में जल्द से जल्द सभी त्रुटियों को दूर कर प्रवेश प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना चाहिए।

आरटीई प्रवेश में हमने बारीकी से नजर बनाया हुआ है अप्रैल तक सभी चरणों को पूरा कर लिया जायेगा-शुभदा गुडेकर, अध्यक्ष, शिक्षण समिति, बीएमसी 

कोई कुछ भी कहे लेकिन असल में हकीकत कुछ और ही है। आरटीई को लेकर स्कूल कितने गंभीर होते हैं यह किसी से छुपा नहीं है। गाहे बगाहे स्कूलों का उदासीन रवैये को लेकर भी इस पर सवाल उठते रहे हैं।

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