26/11 हमला: शहीद की पत्नी का छलका दर्द, कहा सरकार 4 साल से रुला रही है...

सरकार के उपेक्षित रवैये से परेशान सुशीला उघडे

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26/11 हमले को मुंबई पर सबसे बड़ा हमला माना जाता है। इस घटना को याद करते ही आज भी लोगों के शरीर में सिरहन दौड़ जाती है। इस घटना को 26 नवंबर 2017 को 9 साल हो जाएंगे लेकिन इस हमले में अपना सब कुछ गंवा देने वाले लोगों के मन में आज भी उस दिन की यादें ताजा है।

कहते हैं, एक गैर द्वारा दिया गया घाव तो भर जाता है लेकिन जो घाव अपने देते हैं वो ताउम्र नहीं भरता। इस हमले में कई लोगों ने अपना सब कुछ गंवा दिया लेकिन उनके घावों पर मरहम लगाने के बजाय बची खुची कसर सरकार के उपेक्षित रवैये ने पूरी कर दी।


उघडे परिवार की दुनिया उजड़ी 

इन्ही में से एक है सायन में रहने वाला उघडे परिवार। 26/11 के हमले में उघडे परिवार ने अपने घर का मुखिया खो दिया था, नाम था बबन उघडे। बबन कामा अस्पताल में सिक्यूरिटी गार्ड का काम करते थे। घर में अकेले कमाने वाले बबन भी उस हमले में शहीद हो गए थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी सुशीला के अलावा तीन बच्चे थे। सरकार ने भी मदद का हाथ बढ़ाते हुए सुशीला के बड़े बेटे विलास उघडे को कामा अस्पताल में नौकरी दी। इस परिवार को लगा कि उनके घर की खोई खुशियां फिर से खिल उठेंगी।


नियति के साथ सरकार ने भी मारा 

लेकिन नियति को क्कुह और ही मंजूर था, नौकरी करने के 5 साल बाद ही विलास की बीमारी से मौत हो गयी। अब सुशीला पर अपने परिवार को पालने की जिम्मेदारी आ गयी थी। सुशीला ने इसके लिए सरकार से भी मदद मांगी लेकिन सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिली। सुशीला ने अपने दोनों बच्चों को लेकर कई नेताओ और कई अधिकारियों से भी मिली लेकिन उन्हें आज तक आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। 2013 में सरकार की तरफ से सुशीला को यह भरोसा दिया गया था कि उसके दूसरे नंबर बेटे को नौकरी दी जायेगी लेकिन आज चार साल बीत जाने के बाद भी सरकार आंख मूंदे बैठी है।


'सरकार कर रही है भेदभाव'

अपनी गरीबी को याद करते हुए सुशीला की आंखे भर आती हैं। सुशीला कहती है कि घर में कोई कमाने वाला नहीं है, सरकार की तरफ से 4 साल पहले नौकरी देने की बात कही गयी थी लेकिन आज तक कुछ हुआ नहीं। सुशीला आगे कहतीं हैं कि शहीद हुए पुलिस वालों के घर वालों को पेट्रोल पंप दिया, तो हमें क्यों नहीं? सुशीला के अनुसार उनके पति हाथ में लकड़ी का डंडा लेकर आतंवादियों से भीड़ गए और शहीद हो गए लेकिन सरकार का यह गैरजिम्मेदाराना व्यवहार काफी दुःखदायी है।वे सवाल करती हैं कि हमारे साथ इतना भेदभाव क्यों?



















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