स्कूली वाहनों पर पाबंदी लगाना संभव नहीं- बॉम्बे हाईकोर्ट


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स्कूली वैन में बच्चों की सुरक्षा पर याचिका एक दायर पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि स्कूली वैन पर बंदी लगाना संभव नहीं है, लेकिन उसके बदले बच्चों के परिजनों में जागरूकता लाई जा सकती है। गुरुवार को हुई इस सुनवाई में कोर्ट ने निर्देश दिया कि बच्चों को सुरक्षित स्कूल ले जाने और ले आने के लिए पैरेंट्स को भी ध्यान देना चाहिए और सभी स्कूलों को पैरेंट्स में इसके प्रति जागरूकता भी लानी चाहिए। बच्चों की सुरक्षा स्कूल प्रशासन को ही नहीं बल्कि राज्य सरकार की भी जिम्मेदारी है।कोर्ट ने सरकार को अगली सुनवाई में नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूली वाहनों को विवरण जमा करने का निर्देश दिया है।

 
क्या है मामला?

जैसा की सभी जानते हैं कि अमूमन हर घर बच्चे के माता पिता दोनों ही काम के लिए बाहर जाते हैं। बच्चे को स्कूल ले जाने और ले आने के लिए वे स्कूली वैन पर ही निर्भर रहते हैं। लेकिन कुछ घटनाओं को देख कर बच्चों की सुरक्षा पर सवाल भी उठ खड़े हुए, जिन्हे लेकर PTA (पैरेंट्स टीचर एसोसिएशन) यूनाइटेड ने कोर्ट ने इस बाबत एक जनहित याचिका दाखिल की थी। जिसकी सुनवाई न्यायमूर्ति नरेश पाटील और गिरीश कुलकर्णी की बेंच कर रही है।

 
'कई अभिभावक खर्चा नहीं उठा सकते' 

इसके पहले मुख्य सरकारी वकील अभिनंदन वग्यानी ने कहा कि ऑटो में बच्चे को स्कूल ले जाना सुरक्षित नहीं है, सुरक्षा को देखते हुए स्कूल बसगाडी को मंजूरी दी गयी है, जिसे लेकर परिवहन विभाग भी अत्यंत गंभीर है। वग्यानी ने आगे कहा कि राज्य में 1.8 लाख स्कूल हैं जिसमें से 90 हजार स्कूलों में बस या वैन हैं। अनेक पैरेंट्स बस का खर्चा नहीं वहन कर सकते हैं उनके पास अन्य वाहनों का कोई विकल्प भी नहीं है।


कोर्ट ने स्कूल के रवैये पर उठाया सवाल

इस पर कोर्ट ने कहा कि बच्चे सकुशल स्कूल पहुंचे यह देखना पैरेंट्स की भी जिम्मेदारी है। सीट फुल जाने पर एडमिशन बंद कर देते हैं और बच्चे स्कूल कैसे आते जाते हैं इस तरफ स्कूल ध्यान नहीं देता, स्कूल का यह रवैया ठीक नहीं है।

पैरेंट्स बने जागरूक 

सुनवाई में कोर्ट ने आगे कहा कि छात्र किस वाहनों से स्कूल आते जाते हैं इसकी जाँच प्रशासन हर समय नहीं कर सकता, इसीलिए इस बात की जिम्मेदारी स्कूल और बच्चों के परिजनों की भी है कि इस तरफ भी ध्यान दें। स्कूल वैन पर पाबंदी लगाने से बच्चे के परिजन ही परेशान होंगे, उसके बदले परिजनों में जागरूकता लाकर इसे और भी सुरक्षित बनाया जा सकता है।  



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