भारतीय होने पर गर्व कराती फिल्म 'गाजी अटैक'

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भारतीय होने पर गर्व कराती फिल्म 'गाजी अटैक'
भारतीय होने पर गर्व कराती फिल्म 'गाजी अटैक'
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मुंबई  -  

मुंबई - बॉलीवुड में युद्ध पर फिल्म बनना कोई नई बात नहीं है। आजादी के बाद से ही अब तक कई फ़िल्में देशभक्ति और युद्ध पर बन चुकी है जिनमे से कई सफल अतो कई असफल हुई है। अब तक बनने वाली फ़िल्में जमीन पर लड़ी जाने वाली लड़ाई बेस्ड होती थी या थोड़ी बहुत हवाई युद्ध के सीन भी डाल दिए जाते थे। लेकिन यह पहली बार है कि जब पानी के अंदर लड़ी गयी लड़ाई को फिल्म के जरिये दिखाया गया है। कहा जाता है कि 1971 नवंबर में भारत पाकिस्तान के बीच लड़ी गयी लड़ाई के पहले एक और युद्ध हुआ था जिसका कोई इतिहास कभी सामने नहीं आया। यह लड़ाई नेवी के द्वारा लड़ा गया था।

अपनी पहली ही फिल्म में प्रचलित कायदों को तोड़ते निर्देशक संकल्प रेड्डी बधाई के हकदार हो जाते हैं। इतिहास के समंदर में ऐसी कई कहानियां होंगी जिनके नायकों को पर्याप्त सम्मान तो छोड़िए, नाम तक नहीं मिल पाया। यह फिल्म ऐसे वीरों का तो सम्मान करती ही है, कहानीकारों और फिल्मकारों को इस दिशा में बढ़ने को भी कहती है। फिल्म की कहानी के अनुसार 1971 नवंबर में पाकिस्तान ने बंगाल की खाड़ी में बांग्लादेश की तरफ अमेरिका से लिया हुआ ‘गाजी’ युद्धपोत भेजा था। गाजी का टारगेट विशाखापटनम है। भारतीय सुरक्षा दलों (नेवी) को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने इस रोकने के लिए तीन अधिकारीयों की टीम बनाती है। जिसमें लेफ्टिनेंट कमांडर अर्जुन वर्मा (राणा डग्गूबाती), कैप्टेन रणविजय सिंह(के. के. मेनन) और एग्जीक्यूटिव ऑफिसर देवराज (अतुल कुलकर्णी) है। यही तीनों अधिकारी अपनी टीम और आईएनएस विक्रांत के जरिये दुश्मनों का खात्मा करते हैं।
फिल्म में एक्शन, रोमांच, उग्र डायलॉग, देशभक्ति का मेलोड्रामा वगैरह हैं लेकिन ये फालतू नहीं लगते। मगर यह फिल्म इतनी कसी हुई भी नहीं है कि आप बिना पलक झपकाए, मुठ्ठियां भींचे इसे देखते रहें। दृश्यों का दोहराव और बहुत ज्यादा तकनीकी भाषा का इस्तेमाल इसकी रेंज को सीमित करते हैं। नौसैनिकों की दुनिया पर अपने यहां इस कदर विस्तार से कभी बात नहीं हुई है। पनडुब्बी विक्रांत के दो अफसरों के बीच के टकराव के बहाने यह फिल्म सैन्य ऑपरेशंस में राजनीति की गैरजरूरी घुसपैठ की बात भी करती है। फिल्म यह भी बताती है कि जोश, जज्बे और दिमाग के शानदार मेल से कैसे किसी लड़ाई का हश्र बदला जाता है। उग्र स्वभाव वाले कप्तान के रोल में के.के. मेनन जंचते हैं तो चुप रहने वाले अफसर के किरदार में राणा डग्गूबाती भी। लेकिन अतुल कुलकर्णी कैसे इन दोनों से आगे निकल जाते हैं, यह उन्हें देख कर ही समझा जा सकता है। तापसी पन्नू और ओमपुरी का छोटा सा किरदार भी अच्छा लगता है। फिल्म में एक भी गाना नहीं डाला गया है।

मंदार जोशी

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