कांदिवली की इस लड़की ने स्काईवाक को ही बना दिया स्कूल

हेमंती कहती है कि, मेरी टीम की मेहनत का फल यही है कि आज उनके स्कूल के छह बच्चे भीख मांगना छोड़ कर स्कूल में दाखिला लेकर पढ़ रहे हैं।

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अगर कोई आपसे पूछे कि अक्सर 22 साल की आम युवतियों की दुनिया क्या होती हैं? तो आप का जवाब यही होगा कि उनकी दुनिया सोशल मीडिया, पढ़ाई-लिखाई, जॉब या फिर दोस्ती, प्रेम मौज मस्ती के इर्द गिर्द ही घूमती होगी, लेकिन कांदिवली की रहने वाली हेमंती सेन का काम देख कर आपकी यह धारणा बदल जाएगी।

आपको जानकर हैरानी होगी कि हेमंती सेन कांदिवली के स्काईवाक पर क्लास चलाती है जिसमें वे छोटे-छोटे बच्चे पढ़ते हैं जो वहां पहले भीख मांगा करते थे। हेमंती की यह क्हलास हर आने जाने वाले लोगों के आकर्षण का केंद्र होती है। हेमंती 'जूनून' नामक एक एनजीओ भी चलाती है जिसमें महिला पुरुष कुल मिलाकर 14 लोग काम करते हैं। 'जूनून' के तहत ही वह कई गरीब और भीख मांगने वाले छोटे बच्चों को निशुल्क पढ़ाती है। 

 

आसां नहीं था रास्ता

मुंबई लाइव से बात करते हुए हेमंती कहती है कि इन्हें पढ़ाने से पहले वह हर दिन जब वह काम पर जाती तो इन बच्चों को भीख मांगते हुए देखा करती थीं। इन्हे देख कर उनके मन में एक टीस होती थी। हेमंती कहती है कि शिक्षा हर बच्चों का अधिकार है। पैसों की तंगी के चलते यह गरीब बच्चे पढ़ नहीं पाते, इसीलिए उन्होंने इन बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा उठाया। हेमंती कहती हैं कि उन्होंने इस बारे में कई स्कूलों से बात की, लेकिन सभी स्कूल कुछ न कुछ कारण बता कर मना कर देते थे। साथ ही जिन स्कूलों ने पढ़ाने के लिए हामी भी भरी उन्हें इस बात की आशंका थी कि बच्चे स्कूल रेगुलर नहीं आएंगे। आखिर सभी जगह से हेमंती को निराशा ही हाथ लगी।  

इसीलिए उन्होंने खुद ही इन बच्चों को पढ़ाने का निर्णय लिया। हेमंती के मुताबिक इन छोटे बच्चों को पढ़ाना इतना आसान काम नहीं था। लेकिन उन्होंने इसे करने का संकल्प लिया। इसके लिए वे सबसे पहले इन बच्चों के मां-बाप से मिलीं। उनसे बात की, लेकिन कोई भी मानने को तैयार नहीं हुआ। हेमंती ने सबसे कहा कि इस काम के लिए वे कोई भी पैसे नहीं लेंगी बल्कि अपनी तरफ से किताबम कॉपी, पेन पेन्सिल वगैरह सब मुफ्त में देंगी। काफी समझाने के बाद कुछ लोग अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए तैयार हुए।

शुरू में जगह की दिक्कत हुई, जिसके बाद उन्होंने स्काईवाक को ही स्कूल बना लिया, क्योंकि यहां बच्चे आसानी से आ और जा सकते थे। जब पढ़ाना शुरू किया तो कभी बच्चे आते तो कभी नहीं आते, खुद हेमंती बच्चों को खोज-खोज कर लाती और उन्हें पढ़ाती। धीरे-धीरे बच्चों के घर वालों ने भी हेमंती का साथ देना शुरू कर दिया। बच्चे भी पढ़ने में इंटरेस्ट लेने लगे. उसके बाद कहीं जाकर सब सही हुआ। यही नहीं वे कहती हैं कि इसी के बाद उन्हें 'जूनून' की स्थापना करने का भी ख्याल आया।



मेहनत का फल मीठा 

इस समय हेमंती कुल 15 बच्चों को पढ़ा रही है जिसमें लड़के और लड़कियां दोनों शामिल हैं। हेमंती इन बच्चों को हिंदी वर्णमाला, अंग्रेजी के सभी लेटर, गिनती,पहाड़ा तो पढ़ाती ही हैं, साथ में इन्हें ड्राइंग, डांसिंग, क्राफ्ट जैसे सब्जेक्ट भी सिखाती हैं।

हेमंती कहती है कि, मेरी टीम की मेहनत का फल यही है कि आज उनके स्कूल के छह बच्चे भीख मांगना छोड़ कर स्कूल में दाखिला लेकर पढ़ रहे हैं।


स्पेशल टाईमटेबल

बच्चों की पढ़ाई के बारे में बताते हुए हेमंती कहती है कि पहले मुझे भी अडजस्ट करने में थोड़ा टाइम लगा। समय की कमी के चलते पहले मैं एक-एक दिन गैप करके इन बच्चों को पढ़ाने आया करती थी, लेकिन नवंबर से मैं हर दिन आने लगी। बच्चों की पढ़ाई के लिए टाइम टेबल बनाया गया है। वे कहती हैं कि शनिवार और रविवार को इन बच्चों की स्पेशल क्लास चलती है। इन दो दिन इन्हें डांसिंग, ड्राइंग, क्राफ्ट जैसे क्लास चलाये जाते हैं, जबकि मंगलवार, गुरुवार और शुक्रवार को हिंदी बारहखड़ी, कविता और बाकी की पढ़ाई कराई जाती है. जबकि बुधवार को नुक्कड़ नाटक का आयोजन किया जाता है।



पैसों की भी होती है किल्लत 

हेमंती यह सब काम बिना किसी सरकारी अथवा गैरसरकारी मदद के कर रही है। हेमंती के मुताबिक 15 बच्चों को पढ़ाने में उसका हर महीने लगभग 25 से 30 हजार रूपये का खर्चा होता है, लेकिन वह किसी तरह से इसे लगातार चला रही है। कई बार उसे आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ा लेकिन हेमंती हार नहीं मानती हैं। हेमंती इस काम के लिए पब्लिक फंड जुटाने की भी बात करती हैं। उनका कहना है कि कोई भी इंसान अगर इन बच्चों की पढाई के लिए इच्छा रखता है तो वह haimanti@junoon.org.in आईडी पर मेल कर सकता है। इसके अलावा वह haimantisen@obc पर UPI से पेमेंट भी कर सकता है।


जज्बा और हिम्मत है कायम 
इतना सब कुछ होने के बाद भी हेमंती के जज्बा जर भी कम नहीं है। इन बच्चों को अपने परिवार का हिस्सा मानने वाली हेमंती चाहती हैं कि ये बच्चे पढ़ लिख कुछ बने, देश और समाज के लिए कुछ अच्छा करें। वे कहती हैं कि इनके जरिये वे अपना भी सपना साकार कर रही हैं। वे चाहती हैं कि इस दुनिया में कोई भी बच्चा भीख नहीं मांगे, दूसरों के सामने हाथ फ़ैलाने से अच्छा है कि इन्हें किताब और कलम दिया जाए। जज्बे से भरी इस कहानी को देखने के लिए मिलिए हेमंती से:-


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