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ballot paper vs EVM: जानें दोनों के लाभ और हानि


ballot paper vs EVM: जानें दोनों के लाभ और हानि
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अभी हाल ही में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ईवीएम के विरोध में टीएमसी की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मिले। उन्होंने इस मुलाकात के बाद पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि, वे 21 अगस्त को EVM के खिलाफ आंदोलन करने वाले हैं, उसी सिलसिले में वे ममता बैनर्जी को आमंत्रित करने आये थे। इसके पहले राज ठाकरे इसी मुद्दे को लेकर यूपीए की पूर्व चेयरपर्सन सोनिया गांधी और केंद्रीय मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा से मिले थे।

EVM पर उठते रहे हैं सवाल 
यह पहली बार नहीं है कि EVM पर सवाल उठाया गया हो इसके पहले भी हारने वाली पार्टी EVM को लेकर हमेशा सवाल उठती रही है। साल 2009 में जब बीजेपी भी लोकसभा का चुनाव हारी थी तब बीजेपी के सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सवाल उठाए थे, और अब जब बीजेपी बहुमत से जीती है तो कांग्रेस, BSP, SP, AAP, TMC, NCP सहित तमाम अन्य पार्टियों ने भी EVM पर सवाल उठाते हुए बीजेपी पर चीटिंग से चुनाव जीतने का आरोप लगाया।

वैसे आजादी के बाद से अभी हाल तक बैलेट पेपर से चुनाव हुए हैं, लेकिन बैलेट पेपर चुनाव को लेकर भी कई बार चुनाव प्रक्रिया बाधित करने की कोशिश की गयी है। आइये आपको बताते हैं कि बैलेट पेपर से चुनाव के दौरान आने वाली परेशानियां-

पढ़ें: विपक्षी पार्टियों की मांग , EVM की जगह हो बैलेट पेपर से चुनाव

बैलेट पेपर से हानियाँ 

  • बैलेट बॉक्स लूट लेना
  • बैलेट बॉक्स में पानी डाल देना या आग लगा देना 
  • रिजल्ट आने में काफी समय 
  • बैलेट से चुनाव में काफी समय और धन का खर्च 
  • बूथ को कैप्चर करने की कोशिश 
  • पिछड़े और कमजोर लोगों को चुनाव नहीं डालने के लिए धमकाना 
  • किसी की जगह कोई और डालता था वोट  
  • कई वोट हो जाते थे अनवैलिड 

बैलेट पेपर से लाभ 

बैलेट पेपर किसी भी प्रकार की तकनीकी से नहीं जुड़ा है इसीलिए इसे हैक करने का कोई सवाल ही नहीं  होता जैसे कि ईवीएम पर सवाल उठाए जाते हैं।

होने लगी ईवीएम की मांग 

तमाम परेशानियों को देखते हुए ईवीएम की मांग की गयी. 1982 में पहली बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन आई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून में इसका प्रावधान नहीं है। इस वजह से जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करके ईवीएम के जरिए भी चुनाव कराने की बात जोड़ी गई।

2004 से पहले तक दोनों पद्धतियां यानी पेपर बैलेट और ईवीएम दोनों के जरिए चुनाव हुए. 2004 का लोकसभा चुनाव पूरी तरह ईवीएम के जरिए हुआ। अब पूरे देश में ईवीएम के जरिए लोकसभा और विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। 2019 का लोकसभा चुनाव पहला ऐसा चुनाव होगा, जिसमें हर ईवीएम के साथ वीवीपैट मशीन लगाई जाएगी।

  • EVM पारदर्शी नहीं है.
  • EVM में दोबारा मतगणना संभव नहीं
  • आधुनिक लोकतंत्र EVM से राष्ट्रीय स्तर का मतदान नहीं कराते
  • जिन देशों से ये टेक्नोलॉजी आई, वे भी पेपर बैलेट पर भरोसा करते हैं.
  • जो मशीन ठीक की जा सकती है, उसे खराब भी किया जा सकता है.
  • लगभग सभी प्रमुख दल कभी न कभी EVM को अविश्वसनीय बता चुके हैं.
  • पेपर बैलेट की किसी भी कमी का जवाब नहीं हैं EVM
  • EVM से चुनाव का समय नहीं बचता
  • यह कहना अवैज्ञानिक है कि EVM में छेड़छाड़ असंभव है
  • लोकतंत्र में भरोसा कायम रखने के लिए जरूरी है बैलेट पेपर

EVM से लाभ 

मार्च 2017 में ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक-

  • राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्यों में जहां चुनावी हेराफेरी से बार-बार चुनाव कराने पड़ते थे, वहां EVM से वोटिंग के बाद धांधली की घटनाओं में कमी आई।
  • EVM से चुनावों ने समाज के कमजोर और पिछड़े वर्गों (महिलाओं और अनुसूचित जाति) को मजबूत किया है. वो अब अपने वोट डालने की संभावना को अधिक रखते हैं।
  • EVM ने वोटिंग को अधिक प्रतिस्पर्धी बना दिया है. जीतने वाले का मार्जिन और जीतने वाली पार्टी का वोट शेयर घटा है।
  • आंकड़ों के मुताबिक, EVM के कारण बिजली सप्लाई में इजाफा हुआ है।
  • EVM के इस्तेमाल से अपराध की घटनाओं में काफी कमी आई है।

आपको बतादें कि चुनाव आयोग और सरकार का फ़र्ज़ और दायित्व है कि वो ये सुनिश्चित करे कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के साथ किसी तरह की हेराफेरी नहीं की गई है क्योंकि लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में जनता का विश्वास होना जरूरी है। हमें लगता है कि आवश्यकता इस बात की नहीं है कि ईवीएम मशीनों का प्रयोग रोका जाए बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि इसमें और जहां तक गुंजाईश हो सुधार किया जाना चाहिए। इसके साथ ही प्रशासन के साथ-साथ लोगों में भी राजनीतिक इमानदारी पैदा होना बहुत जरुरी है।

पढ़ें: मुख्यमंत्री का पलटवार, 'EVM को दोष देने के बजाय विपक्ष मंथन करे'


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